आम के बाग में अक्टूबर से दिसंबर तक न करें ये 5 गलतियां, वरना अगली फसल पर पड़ सकता है असर—देखें क्या है पूरा सच – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: Mango Farming Tips: आम के बाग से अच्छी पैदावार के लिए किसान पूरे साल मेहनत करते हैं. लेकिन कई बार ज्यादा खाद डालने, बार-बार सिंचाई करने या गलत समय पर पेड़ों की कटाई-छंटाई करने की वजह से अगली फसल पर असर पड़ सकता है. अक्टूबर से दिसंबर के बीच आम के बागों को खास देखभाल की जरूरत होती है. इस दौरान पेड़ के अंदर अगली फसल के लिए तैयारी चल रही होती है. ऐसे में बिना जरूरत छेड़छाड़ करने से फूल आने और फल बनने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.

वैसे तो आम का पेड़ सालभर हरा-भरा रहता है, लेकिन इसकी बढ़त बर मौसम में एक जैसी नहीं होती है. बिहार स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने किसान इंडिया (Kisan India) को बताया कि, बारिश के बाद पेड़ पर निकली नई टहनियों और पत्तियों को मजबूत होने के लिए समय की जरूरत होती है. सर्दियों में तापमान और पेड़ की अंदरूनी स्थिति का असर इस बात पर पड़ता है कि आगे चलकर कितने फूल आएंगे. इसलिए अक्टूबर से दिसंबर के बीच बाग में किसी भी काम के लिए जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. आपको जरूरत के हिसाब से ही काम करना चाहिए. इसके साथ ही बिना वजह पेड़ को परेशान करने से बचना सबसे ज्यादा जरूरी है.

बारिश के बाद अगर खेत की मिट्टी में पर्याप्त नमी है, तो बार-बार पानी देने की जरूरत नहीं होती. जरूरत से ज्यादा सिंचाई करने पर मिट्टी में हवा की कमी हो सकती है. अगर पानी खेत में जमा रहने लगे, तो जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और उनमें बीमारी लगने का खतरा बढ़ सकता है.

डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, बिना जरूरत ज्यादा नाइट्रोजन वाली खाद डालने से पेड़ पर नई-नई टहनियां निकल सकती हैं. अगर ये टहनियां फूल आने के समय तक पूरी तरह मजबूत नहीं हो पातीं, तो इसका असर अगली फसल पर पड़ सकता है. इसलिए खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच, पेड़ की उम्र और उसकी पिछली पैदावार को ध्यान में रखें.

किसान अक्सर चाहते हैं कि, उनके आम के पेड़ हमेशा हरे-भरे रहें. लेकिन अच्छी फसल के लिए केवल पत्तियों का हरा होना काफी नहीं है. पेड़ की टहनियों का सही समय पर मजबूत होना, मौसम और पोषण का संतुलन भी जरूरी है. आम की कुछ किस्मों में एक साल अच्छी पैदावार होने के बाद अगले साल कम फल लगते हैं. इसे एकांतर फलन कहा जाता है. भारत सरकार के 10 फरवरी 2026 के लोकसभा संबंधी आधिकारिक स्पष्टीकरण के अनुसार, दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फजली और अल्फांसो जैसी किस्मों में यह समस्या देखी जाती है. इस पर पेड़ की किस्म, पिछले साल लगे फलों की संख्या, मौसम और बाग की देखभाल का असर पड़ सकता है.

सर्दियों में यह मान लेना सही नहीं है कि आम के पेड़ों पर कीट और बीमारियां नहीं लगेंगी. एन्थ्रेक्नोज, पाउडरी मिल्ड्यू और टहनियों के सूखने जैसी समस्याओं पर नजर रखना जरूरी है. नमी और मौसम के अनुकूल होने पर बीमारी का खतरा बना रह सकता है. किसान समय-समय पर पत्तियों, टहनियों और कलियों को देखें. अगर बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो पहले उसकी सही पहचान कराएं. बिना जानकारी के कीटनाशक या फफूंदनाशक का छिड़काव न करें.

आम के पेड़ की जड़ें केवल तने के आसपास ही नहीं होतीं, बल्कि पेड़ की छाया के नीचे दूर तक फैली रहती हैं. तने के पास गहरी खुदाई या बार-बार जुताई करने से जड़ों को चोट लग सकती है. इससे पेड़ को पानी और पोषक तत्व लेने में परेशानी हो सकती है. अगर बाग में पानी जमा हो रहा है, तो जड़ों के पास खुदाई करने के बजाय पानी की निकासी ठीक करने पर ध्यान दें. सूखी या बीमार शाखाओं को हटाने की जरूरत हो, तो छंटाई का सही समय स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से पूछकर तय करें.

इस दौरान किसान मिट्टी में नमी की जांच करते रहें और जरूरत के हिसाब से ही सिंचाई करें. बिना जरूरत खाद डालने, गहरी खुदाई करने और रासायनिक दवाओं का छिड़काव करने से बचें. पेड़ों की नियमित निगरानी करें और रोगग्रस्त शाखाओं या पत्तियों पर ध्यान दें.

सबसे जरूरी बात यह है कि हर बाग की जरूरत एक जैसी नहीं होती. पेड़ की उम्र, आम की किस्म, मिट्टी और स्थानीय मौसम के हिसाब से देखभाल का तरीका बदल सकता है. इसलिए खाद, सिंचाई और छंटाई का फैसला स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर करें. सही समय पर सही देखभाल से आम के पेड़ों को स्वस्थ रखने और अगली फसल की बेहतर तैयारी करने में मदद मिल सकती है.

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