एग्रीवेट: महाराष्ट्र के लातूर जिले की सभी 10 तहसीलों में सूखा घोषित होने के बाद प्रशासन ने पशुओं के चारे की कमी रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है. प्रशासन ने फसल अवशेषों का इस्तेमाल औद्योगिक ईंधन के रूप में करने पर रोक लगा दी है. साथ ही, पशुओं के चारे की जिले से बाहर बिक्री और ढुलाई पर भी पाबंदी लगा दी गई है. प्रशासन के आदेश के मुताबिक, बायो-कोल परियोजनाएं, बायोमास ऊर्जा संयंत्र, ईंट भट्ठे, चीनी मिलें और दूसरी औद्योगिक इकाइयां पशुओं के चारे के काम आने वाले फसल अवशेषों को ईंधन के रूप में खरीद, जमा या इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी. इन अवशेषों को केवल पशुओं के चारे के लिए सुरक्षित रखना होगा.
जिला कलेक्टर भरत बस्तेवाड ने हिन्दुस्तान टाइम्स को कहा कि 2026 के खरीफ सीजन में कम बारिश और फसलों को हुए नुकसान से चारे का उत्पादन काफी प्रभावित होने की आशंका है. ऐसे में सोयाबीन, ज्वार, मक्का, गेहूं, चना और अरहर के फसल अवशेष पशुओं के लिए जरूरी चारा उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएंगे. इसके अलावा, गन्ने की सूखी पत्तियों और चीनी मिलों से निकलने वाले बगास का इस्तेमाल भी पशुओं की चारे की जरूरत पूरी करने के लिए किया जाएगा.
प्रशासन के मुताबिक, कई औद्योगिक इकाइयां बड़ी मात्रा में इन अवशेषों का इस्तेमाल ईंधन के रूप में कर रही थीं. इसी वजह से इनके इस्तेमाल और जिले से बाहर बिक्री व ढुलाई पर पाबंदी लगाई गई है. जिला कलेक्टर और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रमुख भरत बस्तेवाड ने शुक्रवार को यह आदेश जारी किया. यह आदेश महाराष्ट्र चारा (निर्यात नियंत्रण) आदेश, 2001 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत दिया गया है. नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए राजस्व, पुलिस, परिवहन, कृषि और पशुपालन विभाग के अधिकारियों को जांच करने का अधिकार दिया गया है.
प्रशासन ने साफ किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों, व्यापारियों, वाहन चालकों और औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. दोषियों पर चारा नियंत्रण, आवश्यक वस्तु और आपदा प्रबंधन से जुड़े कानूनों के साथ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रावधानों के तहत भी कार्रवाई हो सकती है. आने वाले महीनों में पशुओं के चारे की संभावित कमी को देखते हुए प्रशासन ने VB-G RAM G योजना के तहत चारा उत्पादन की पहल भी शुरू की है. इसका उद्देश्य पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाना है.
महाराष्ट्र के लातूर जिले में पांच लाख से ज्यादा पशुधन के लिए चारे की व्यवस्था करना प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती है. मौजूदा चारे का भंडार केवल दो महीने तक चलने का अनुमान है. ऐसे में प्रशासन ने पहले चरण में 5,000 हेक्टेयर जमीन पर चारा उगाने का लक्ष्य रखा है. इससे करीब 2 लाख मीट्रिक टन चारा मिलने की उम्मीद है. वहीं, सिंचाई की सुविधा वाले किसानों को महाबीज के स्पीडफीड ज्वार के बीज मुफ्त दिए जाएंगे. एक से पांच एकड़ तक खेती करने वाले किसानों को मजदूरी और कृषि सामग्री सहित खेती के खर्च के लिए प्रति एकड़ 1.21 लाख रुपये तक की सहायता मिल सकती है.
ज्वार की यह फसल करीब 55 दिनों में पहली कटाई के लिए तैयार हो जाएगी. इसके बाद 35 से 40 दिनों के अंतराल पर दो और कटाई की जा सकती हैं. किसान इस चारे का इस्तेमाल अपने पशुओं के लिए कर सकेंगे या दूसरे पशुपालकों को बेच सकेंगे. जिला कलेक्टर भरत बस्तेवाड के मुताबिक, प्रशासन को 10,000 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर चारा उगाने के आवेदन मिले हैं. सिंचाई की सुविधा की जांच के बाद किसानों को काम शुरू करने के आदेश दिए जाएंगे.
प्रशासन के अनुमान के मुताबिक, लातूर जिले में जुलाई 2027 तक पशुओं के लिए करीब 4 लाख मीट्रिक टन चारे की जरूरत होगी. इसके लिए चीनी मिलों से निकलने वाले बगास से पौष्टिक पशु आहार बनाने और किसानों से कम विकसित गन्ना खरीदकर उसे चारे के रूप में इस्तेमाल करने की योजना भी है. आगे कितनी जमीन पर चारा उगाया जाएगा, यह पानी की उपलब्धता पर निर्भर करेगा.