खाद खरीदने वाले किसान बढ़े, फिर 28 फीसदी कैसे घटी खपत? FFS प्रोजेक्ट पर जानें एक्सपर्ट की राय – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: Fertilizer Consumption: केंद्र सरकार के फ्रेमवर्क फॉर फर्टिलाइजर्स सेल्स (FFS) के पायलट प्रोजेक्ट का असर अब जमीन पर दिखने लगा है. सरकार के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, इस योजना के लागू होने के बाद खाद की खपत में 28 फीसदी की कमी आई है, जबकि खाद खरीदने वाले किसानों की संख्या बढ़कर 46.97 लाख हो गई है. इससे सरकार को खाद के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल रही है. वहीं, खाद का इस्तेमाल कम होने से मिट्टी की सेहत में भी सुधार की उम्मीद है. आइए जानते हैं कि यह योजना सरकार और किसानों के लिए कैसे फायदेमंद साबित हो रही है.

दरअसल, केंद्र सरकार ने खरीफ 2026 के दौरान फ्रेमवर्क फॉर फर्टिलाइजर्स सेल्स  (FFS) का पायलट प्रोजेक्ट 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 222 जिलों में शुरू किया. इसके तहत किसानों को उनकी जमीन और चुनी गई फसल के हिसाब से सब्सिडी वाली खाद खरीदने की सुविधा दी गई. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इन जिलों में खाद खरीदने वाले किसानों की संख्या बढ़ी, लेकिन खाद की कुल बिक्री में करीब 28 फीसदी की गिरावट आई. इससे सरकार को लगभग 1,470 करोड़ रुपये की बचत हुई. ऐसे में सवाल उठता है कि जब खाद खरीदने वाले किसानों की संख्या बढ़ी है, तो इसकी कुल खपत में 28 फीसदी की कमी कैसे आ गई? इसको लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं. हालांकि, कृषि विशेषज्ञों और किसान नेताओं का कहना है कि सरकार के इस दावे के पीछे कुछ वजहें हो सकती हैं. वे अपने-अपने तर्कों से इसे सही ठहरा रहे हैं.

कृषि विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार निर्मल यादव ने किसान इंडिया से बातचीत में कहा कि फार्मर रजिस्ट्री की वजह से FFS का पायलट प्रोजेक्ट धीरे-धीरे सफल हो रहा है. उनके मुताबिक, पहले सरकार के पास किसानों की जमीन और खेती से जुड़ी पूरी जानकारी नहीं थी. सरकार को यह पता नहीं होता था कि किस किसान के पास कितनी जमीन है और वह साल में कौन-कौन सी फसल उगाता है. निर्मल यादव ने कहा कि फार्मर रजिस्ट्री बनने के बाद सरकार के पास किसानों की जमीन और फसल से जुड़ी जानकारी उपलब्ध हो गई है. इससे किसानों को उनकी जमीन और फसल की जरूरत के हिसाब से खाद खरीदने में मदद मिल रही है. अगर कोई किसान जरूरत से ज्यादा खाद की मांग करता है, तो सरकारी अधिकारी उसे बताते हैं कि उसकी जमीन और फसल के लिए कितनी खाद पर्याप्त है. ऐसे भी जरूरत से ज्यादा खाद डालने से मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंच सकता है. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से किसानों ने खाद की खरीद और इस्तेमाल कम किया है. इससे किसानों का पैसा बच रहा है और खाद का संतुलित इस्तेमाल होने से मिट्टी की सेहत में सुधार की उम्मीद है.

भारतीय किसान यूनियन मान गुट के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर गुणी प्रकाश, निर्मल यादव से अलग राय रखते हैं. उनका कहना है कि पहले हरियाणा, पंजाब समेत कई राज्यों में सब्सिडी वाली खाद की कालाबाजारी होती थी. उनके मुताबिक, दलाल और व्यापारी फर्जी किसानों के नाम पर सब्सिडी वाली खाद खरीदा करते थे. इसके बाद वे इस खाद को प्लाईवुड और प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों को ऊंचे दाम पर बेच देते थे. उन्होंने कहा कि इस वजह से छोटे और सीमांत किसानों को जरूरत के मुताबिक खाद नहीं मिल पाती थी. मजबूरी में उन्हें ब्लैक मार्केट से महंगे दाम पर खाद खरीदनी पड़ती थी. लेकिन सरकार की सख्ती के बाद खाद को फैक्ट्रियों में बेचने के इस चलन पर रोक लगी है. इससे खाद की कुल खपत में कमी आई है. ठाकुर गुणी प्रकाश ने यह भी कहा कि अब पढ़े-लिखे युवा बागवानी फसलों की खेती की ओर बढ़ रहे हैं. इससे खेती से जुड़ने वाले और खाद खरीदने वाले किसानों की संख्या में इजाफा हो रहा है. हालांकि, हमें किसान रजिस्ट्री के बारे में भी जान लेना चाहिए? आखिर यह किसानों और सरकार को कैसे मदद कर रही है.

फार्मर रजिस्ट्री किसानों की डिजिटल पहचान है. इसमें किसानों की जमीन, खेती, फसल और अन्य कृषि संबंधी जानकारियां दर्ज की जाती हैं. इन जानकारियों को एक यूनिक आईडी से जोड़ा जाता है. यह आईडी आधार और जमीन के रिकॉर्ड से लिंक होती है, जिससे किसान से जुड़ी जानकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य असली किसानों की पहचान करना और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पात्र किसानों तक पहुंचाना है. साथ ही फार्मर रजिस्ट्री से सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली खाद, बीज, कृषि उपकरण और अन्य कृषि सामग्री पर सब्सिडी का लाभ सीधे पात्र किसानों तक पहुंचाने में मदद मिलती है. इससे किसानों को बार-बार दस्तावेजों का सत्यापन कराने की जरूरत कम पड़ती है. साथ ही, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की प्रक्रिया भी आसान होती है. बड़ी बात यह है कि फार्मर रजिस्ट्री से किसान को कितनी खाद की जरूरत है, इसकी भी जानकारी दी जाती है.

कृषि विशेषज्ञ निर्मल यादव का कहना है कि पहले किसान ज्यादा पैदावार लेने के लिए जरूरत से ज्यादा खाद का इस्तेमाल करते थे. लेकिन फार्मर रजिस्ट्री से किसानों की जमीन और फसल की जानकारी मिलने के बाद अब उन्हें खेत की जरूरत के हिसाब से खाद मिल रही है. इससे खाद का इस्तेमाल कम करने में मदद मिली है. खाद का संतुलित इस्तेमाल होने से मिट्टी की सेहत में सुधार हो सकता है और अनाज की गुणवत्ता में भी सुधार की उम्मीद है

रासायनिक खादों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है. खाद का संतुलित इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिल सकती है. इससे मिट्टी में जैविक कार्बन और जैविक पदार्थों की मात्रा बनाए रखने में मदद मिलती है. ये तत्व मिट्टी को उपजाऊ बनाने और उसकी गुणवत्ता सुधारने में अहम भूमिका निभाते हैं. वहीं,जब किसान खेतों में जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन और फॉस्फेट वाली खाद डालते हैं, तो इसका असर फसलों पर भी पड़ सकता है. पौधे जरूरत से ज्यादा पोषक तत्व सोख लेते हैं, जिससे कुछ फसलों में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ सकती है. ज्यादा नाइट्रेट वाला भोजन शरीर में पहुंचने पर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए फसलों में जरूरत के हिसाब से ही खाद का इस्तेमाल करना जरूरी है.

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