एग्रीवेट: Paddy Crop Care Tips: सितंबर में धान की फसल में बालियां निकलने और फूल आने का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है. इस दौरान लगातार बारिश, बादल छाए रहने और खेतों में अधिक नमी के कारण कंडवा रोग यानी फाल्स स्मट का खतरा बढ़ जाता है. यह रोग समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो धान की बालियों और दानों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसानों को इस अवस्था में खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए, ताकि शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही बचाव के उपाय किए जा सकें.
कंडवा रोग एक फफूंदजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से धान की बालियां निकलने और फूल आने की अवस्था में तेजी से फैल सकती है. शुरुआत में संक्रमित बालियों पर पीले या नारंगी रंग के छोटे-छोटे धब्बे दिखाई देते हैं. धीरे-धीरे ये धब्बे पीली-हरी गांठों का रूप लेने लगते हैं. फसल पकने के समय यही गांठें काली फफूंद में बदल सकती हैं. ऐसे लक्षण दिखाई देने पर किसानों को इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
विशेषज्ञों के अनुसार, खेत में किसी पौधे या बाली पर कंडवा रोग के लक्षण दिखाई दें तो संक्रमित हिस्से को सावधानीपूर्वक हटाना जरूरी है. किसानों को ऐसी बालियों को हाथ से तोड़कर सीधे खेत में नहीं फेंकना चाहिए, क्योंकि इससे फफूंद के फैलने का खतरा बढ़ सकता है. संक्रमित बालियों को प्लास्टिक बैग में सावधानी से इकट्ठा करके खेत से बाहर ले जाएं और सुरक्षित तरीके से नष्ट करें. इससे बीमारी के आगे फैलाव को रोकने में मदद मिल सकती है.
धान की फसल में अधिक नाइट्रोजन या यूरिया का इस्तेमाल भी कंडवा रोग के खतरे को बढ़ा सकता है. कई किसान बेहतर बढ़वार और अधिक उत्पादन की उम्मीद में जरूरत से ज्यादा यूरिया डाल देते हैं, लेकिन इससे पौधों में रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है. इसलिए किसानों को मिट्टी की स्थिति, फसल की अवस्था और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए. संतुलित पोषण प्रबंधन फसल को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.