धान की पराली से मोटी कमाई! पंजाब में लगा खास प्लांट, बिजली बनाने से लेकर भट्ठों तक सप्लाई—पढ़ें इनसाइड स्टोरी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली किसानों के लिए परेशानी का कारण बनती है. इसे जलाने से जहां प्रदूषण बढ़ता है, वहीं मिट्टी की सेहत पर भी असर पड़ता है. लेकिन अब इसी पराली से कमाई का रास्ता तैयार किया जा रहा है. पंजाब के तरनतारन जिले में एक ऐसा प्लांट लगाया गया है, जहां पराली की गांठें बनाकर बिजली संयंत्रों, थर्मल प्लांट और ईंट-भट्ठों तक पहुंचाई जा रही हैं. जिला प्रशासन के मुताबिक, यह प्लांट हर साल 35 हजार मीट्रिक टन पराली का प्रबंधन कर सकता है. इससे किसानों को पराली बेचकर अतिरिक्त कमाई का मौका मिल रहा है.

पंजाब के तरनतारन जिले के कोट धरम चंद कलां गांव में पराली प्रबंधन  के लिए एक छोटा प्लांट स्थापित किया गया है. यहां बेलर मशीनों की मदद से खेतों से पराली इकट्ठा करके उसकी गांठें बनाई जाती हैं. इन गांठों को आगे बिजली संयंत्रों, थर्मल प्लांट और भट्ठों में इस्तेमाल के लिए भेजा जाता है. जिला प्रशासन के मुताबिक, प्लांट में रोजाना करीब 100 टन पराली की गांठें तैयार की जा सकती हैं. इसकी सालाना क्षमता लगभग 35 हजार मीट्रिक टन है. यह प्लांट 15 से 18 हजार एकड़ में धान की खेती वाले क्षेत्र की पराली का प्रबंधन करने में सक्षम है.

इस प्लांट में तैयार पराली की गांठों  को आगे बायोमास पेलेट्स में बदला जाएगा. इनका इस्तेमाल बॉयलर और थर्मल प्लांट में कोयले के विकल्प के रूप में किया जा सकता है. इससे पराली का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में होगा और किसानों को फसल अवशेष बेचने का एक नया बाजार मिलेगा. किसान और बेलर मशीन संचालक मुख्तियार सिंह के मुताबिक, इस साल से उन्होंने भी इस काम की शुरुआत की है. उनके यहां 8 से 10 बेलर मशीनें पराली की गांठें बनाने में लगी हैं. उनका कहना है कि बेलर मशीनों के इस्तेमाल से फसल कटाई के बाद किसानों के सामने आने वाली पराली प्रबंधन की समस्या कम हुई है.

तरनतारन के डिप्टी कमिश्नर राहुल ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि इस प्लांट को स्थापित करने में सरकार की ओर से 20 से 30 फीसदी तक सब्सिडी दी गई है. इसके अलावा किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) मशीनों के लिए भी सरकारी सहायता उपलब्ध  कराई गई है. प्रशासन किसानों और प्लांट संचालकों को इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. आसपास के 8 से 10 गांवों की पराली का प्रबंधन इस प्लांट के माध्यम से किया जा सकता है. बिजली संयंत्रों और भट्ठों से पूरे साल आपूर्ति के ऑर्डर मिलने से पराली की मांग भी बनी रहती है.

जिला प्रशासन ने पराली जलाने की घटनाओं  को रोकने के लिए जागरूकता अभियान तेज किया है. डिप्टी कमिश्नर के मुताबिक, पिछले तीन महीनों में किसानों के लिए 70 से अधिक फील्ड डेमो कैंप और 150 से ज्यादा सामान्य जागरूकता शिविर लगाए गए हैं. प्रशासन किसानों को पराली प्रबंधन की दो तकनीकों के बारे में बता रहा है. इन-सिटू तकनीक में पराली को खेत में ही मिट्टी में मिलाया जाता है, जबकि एक्स-सिटू तकनीक में पराली की गांठें बनाकर दूसरे उपयोग के लिए भेजा जाता है. प्रशासन का कहना है कि कई किसान जल्दबाजी में पराली जला देते हैं, इसलिए उन्हें वैकल्पिक तरीकों के बारे में जागरूक किया जा रहा है. इस पहल से प्रदूषण कम करने के साथ किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई के अवसर भी तैयार हो सकते हैं.

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