एग्रीवेट: नवरात्रि के बाद अब देशभर में दशहरे और फिर दिवाली के त्योहार की तैयारियां शुरू हो गई हैं. इन त्योहारों में पूजा-पाठ से लेकर घरों की सजावट तक गेंदे के फूलों का खास महत्व होता है. एक ओर विदर्भ और मराठवाड़ा के कई इलाकों में कम बारिश के चलते सूखे जैसे हालात हैं, वहीं दूसरी ओर अकोला के डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय परिसर में खिले गेंदे के केसरिया और पीले फूल हर किसी का ध्यान खींच रहे हैं. हरे-भरे पौधों पर खिले इन रंग-बिरंगे फूलों की खूबसूरती त्योहारों की खुशियों और प्रकृति की जीवंतता का एहसास करा रही है.
दशहरा हो या दिवाली, गेंदे के फूलों के बिना त्योहारों की सजावट अधूरी-सी लगती है. मंदिरों में पूजा, देवी-देवताओं को फूल अर्पित करने, घरों के दरवाजों पर तोरण सजाने और शुभ अवसरों पर फूलों की मालाएं बनाने तक गेंदे का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है.
अकोला के डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय परिसर में गेंदे के पौधों पर खिले केसरिया और पीले फूल इन दिनों खास आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं. हरे-भरे पौधों के बीच खिले चमकीले फूलों का नजारा ऐसा है, मानो प्रकृति ने खुद त्योहारों के स्वागत के लिए रंगों की चादर बिछा दी हो.
इन दिनों गेंदे की फसल में फूल खिलने का दौर किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है. दशहरे और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान फूलों की मांग बढ़ती है. ऐसे में जिन किसानों के पास सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध है, उनके लिए गेंदे की फसल अतिरिक्त आमदनी का एक अवसर बन सकती है. हालांकि, किसानों की वास्तविक कमाई मौसम, उत्पादन, फूलों की क्वालिटी और बाजार में मिलने वाले भाव पर निर्भर करती है.
विदर्भ और मराठवाड़ा के कई क्षेत्रों में कम बारिश और पानी की कमी के कारण खेती प्रभावित हुई है. ऐसे मुश्किल हालात में हरे-भरे पौधों पर खिले गेंदे के फूल उम्मीद और खुशियों का एहसास कराते हैं.
जिन किसानों के पास खेती के लिए पर्याप्त पानी नहीं है, उनके लिए फसल बचाना चुनौती बना हुआ है. वहीं, सिंचाई की सुविधा वाले खेतों में फूलों की खेती त्योहारों के मौसम में आर्थिक अवसर उपलब्ध करा सकती है. हालांकि, इस परिसर में खिले फूलों को पूरे क्षेत्र की कृषि स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता.
भारतीय परंपरा में गेंदे के फूल को शुभता, मंगल और उत्सव से जोड़कर देखा जाता है. इसके चमकीले पीले और केसरिया रंग ऊर्जा, उल्लास और सकारात्मकता का प्रतीक माने जाते हैं.
दशहरे पर मंदिरों, पूजा स्थलों, वाहनों और घरों की सजावट में गेंदे की मालाओं का खूब इस्तेमाल होता है. कई स्थानों पर आयुध पूजा और वाहन पूजा के दौरान भी फूल चढ़ाए जाते हैं.
दिवाली पर घर के मुख्य द्वार, आंगन और पूजा स्थल को गेंदे के फूलों से सजाया जाता है. फूलों के तोरण और मालाएं त्योहार की पारंपरिक सजावट का अहम हिस्सा हैं. इनका उपयोग लक्ष्मी पूजन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है.
गेंदे के फूलों की एक खास विशेषता यह है कि इनकी अनेक किस्मों में चमकीले रंग और अपेक्षाकृत लंबे समय तक बनी रहने वाली ताजगी होती है. इसी कारण पूजा और सजावट के लिए ये फूल काफी पसंद किए जाते हैं.
गेंदे के इन फूलों को देखकर एक तरफ जहां त्योहारों की रौनक का एहसास होता है, वहीं दूसरी तरफ खेती और पानी के बीच के गहरे संबंध की याद भी आती है. बारिश की कमी से जूझ रहे किसानों के लिए हर सफल फसल की अहमियत बढ़ जाती है.
अकोला के कृषि विश्वविद्यालय परिसर में खिले केसरिया और पीले गेंदे के फूल इस समय प्रकृति की खूबसूरती के साथ दशहरे और दिवाली के आगमन का संदेश दे रहे हैं.