एग्रीवेट: इंडियन रनर बत्तख की सबसे बड़ी पहचान इसकी अनोखी बनावट है. यह पेंगुइन की तरह बिल्कुल सीधी खड़ी होकर चलती है. इसका शरीर लंबा और पतला होता है. वहीं, खाकी कैंपबेल की बनावट आम बत्तखों जैसी होती है. इसका शरीर चौड़ा और कद मध्यम होता है.
इंडियन रनर को इसकी सीधी चाल और अलग बनावट के कारण ‘पेंगुइन डक’ भी कहा जाता है. वहीं, खाकी कैंपबेल का रंग हल्का भूरा और जैतून जैसा होता है. यह रंग इसे खुले मैदान और घास-फूस के बीच आसानी से छिपने में मदद करता है.
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अंडा उत्पादन के मामले में दोनों नस्लों के बीच काफी अंतर है. इंडियन रनर बत्तख सालभर में करीब 200 से 220 अंडे देती है. वहीं, खाकी कैंपबेल से अच्छी देखभाल और सही पोषण मिलने पर 250 से 300 अंडे तक मिल सकते हैं.
अगर किसान का मकसद बत्तख के अंडे बेचकर कमाई करना है, तो खाकी कैंपबेल अच्छा विकल्प हो सकती है. इसकी अंडे देने की क्षमता इंडियन रनर से ज्यादा है. यही वजह है कि इसे दुनिया की बेहतर अंडा उत्पादक बत्तख नस्लों में गिना जाता है.
भले ही इंडियन रनर अंडा उत्पादन में खाकी कैंपबेल से पीछे है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इससे अच्छी कमाई नहीं हो सकती. बिहार के मझौलिया प्रखंड के आर्यन जैसे कुछ बत्तख पालक इंडियन रनर का पालन करके सालाना 50 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं.
बत्तख पालन शुरू करने से पहले किसान अपनी जरूरत और इलाके के हिसाब से नस्ल का चुनाव करें. अगर ज्यादा अंडे उत्पादन करना है, तो खाकी कैंपबेल पर विचार कर सकते हैं. वहीं, इंडियन रनर भी अच्छा विकल्प हो सकती है. नस्ल चुनते समय बाजार में अंडों की मांग, चारे की उपलब्धता और बत्तखों की देखभाल का खर्च जरूर ध्यान में रखें.