उत्तराखंड का काला भट्ट क्यों है खास, पोषण से भरपूर इस पारंपरिक दाल की क्यों बढ़ रही मांग? – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: उत्तराखंड का नाम आते ही काला भट्ट का जिक्र जरूर होता है. पहाड़ों में घूमने जाने वाले पर्यटक भी इस पारंपरिक दाल का स्वाद लेना पसंद करते हैं. खाने में स्वादिष्ट होने के साथ ही काला भट्ट पोषक तत्वों से भी भरपूर है. उत्तराखंड के इस काले सोयाबीन यानी काले भट्ट को GI टैग भी मिल चुका है. इससे राज्य के बाहर भी इसकी पहचान और मांग बढ़ रही है. इससे इसका फायदा काले भट्ट की खेती करने वाले किसानों को भी मिल रहा है. आइए जानते हैं कि भट्ट की खेती कैसे की जाती है और इसमें कौन-कौन से पोषक तत्व पाए जाते हैं.

दरअसल, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सोयाबीन को भट्ट कहा जाता है. यहां पारंपरिक रूप से इसकी खेती की जाती है. पहाड़ों में भट्ट की कई किस्में उगाई जाती हैं, जिनमें काला भट्ट प्रमुख है. पहले पुरानी मान्यताओं के कारण लोग काले भट्ट  को ज्यादा महत्व नहीं देते थे. लेकिन, धीरे-धीरे जब लोगों को इसके पोषक तत्वों और फायदों के बारे में जानकारी मिली, तो इसका इस्तेमाल बढ़ने लगा.

काला भट्ट फाइबर का अच्छा स्रोत है. इसमें मौजूद फाइबर कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद कर सकता है. इसमें फाइटोएस्ट्रोजन के साथ डेडजेन और जेनिस्टीन जैसे तत्व भी पाए जाते हैं. इन तत्वों के प्रोस्टेट और स्तन कैंसर के जोखिम से संबंध को लेकर शोध हुए हैं, हालांकि कैंसर की रोकथाम में इनके प्रभाव के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं. ऐसे काला भट्ट थायमिन (विटामिन B1), फॉस्फोरस, आयरन, मैग्नीशियम और पोटेशियम का भी अच्छा स्रोत है. इसमें वसा की मात्रा कम होती है. हालांकि, इसे खाने से कुछ लोगों को गैस की समस्या हो सकती है. इसलिए पकाने से पहले इसे कुछ घंटों तक पानी में भिगोकर रखना बेहतर रहता है.

काले भट्ट में मौजूद फाइबर कोलेस्ट्रॉल कम करने के साथ ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने से रोकने में भी मदद कर सकता है. इसलिए इसे डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस से जूझ रहे लोग संतुलित डाइट का हिस्सा बना सकते हैं. हालांकि, हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर कम होने की समस्या में खानपान का ध्यान डॉक्टर की सलाह के अनुसार रखना चाहिए. काले बीन्स में फोलेट भी पाया जाता है, जो गर्भावस्था के दौरान बच्चे के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व है. इसके अलावा, कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, बीन्स का नियमित सेवन कमर का घेरा बढ़ने के जोखिम को 23 फीसदी तक कम करने से जुड़ा है. हालांकि, इस लाभ के लिए संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि भी जरूरी है.

पहाड़ों में उगाया जाने वाला भट्ट यानी सोयाबीन मूल रूप से पूर्वी एशिया की फसल है. चीन को इसका प्रमुख मूल क्षेत्र माना जाता है. भारत के पहाड़ी इलाकों के अलावा दुनिया के कई देशों में भी सोयाबीन खाया जाता है. पहाड़ों में काले, पीले, भूरे और हल्के सफेद रंग के भट्ट की खेती होती है. यह दलहन परिवार की फसल है और इसके बीज खाने के काम आते हैं. काला भट्ट प्रोटीन, फाइबर और कई जरूरी खनिजों का अच्छा स्रोत है. इसमें आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसमें ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड भी होते हैं. इसके अलावा, इसमें एंटीऑक्सीडेंट तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं.

उत्तराखंड की प्रसिद्ध काली सोयाबीन यानी काला भट्ट को नवंबर-दिसंबर 2023 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला था. यह एक खरीफ फसल है. बरसात के मौसम में इसकी खेती पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से होती है. खरीफ सीजन में काले भट्ट की खेती किसानों के लिए कमाई का अच्छा साधन बन सकती है. जैविक काले भट्ट की बाजार में अच्छी मांग है और किसानों को इसके लिए 90 से 140 रुपये प्रति किलो तक कीमत मिल सकती है.

काले भट्ट की खेती के लिए ऐसी जमीन अच्छी मानी जाती है, जहां पानी आसानी से निकल सके. ढलानदार और उपजाऊ मिट्टी में इसकी फसल बेहतर हो सकती है. खेत में पानी जमा होने से पौधों की जड़ें खराब होने का खतरा रहता है. बुवाई से पहले खेत की 2 से 3 बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए. वहीं, बुवाई से पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा या उपयुक्त फफूंदनाशक से उपचारित करना फसल को रोगों से बचाने में मदद कर सकता है. खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट डालने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. फसल की अच्छी बढ़वार के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करें और खेत में अतिरिक्त पानी जमा न होने दें.

काले भट्ट की फसल तैयार होने पर इसकी कटाई करके अच्छी तरह सुखाना जरूरी है. बीजों में नमी रहने पर भंडारण के दौरान खराब होने का खतरा रहता है. इसलिए इन्हें पूरी तरह सुखाकर सूखी और सुरक्षित जगह पर रखें. जैविक खेती करने वाले किसानों को बाजार में बेहतर कीमत मिल सकती है, हालांकि वास्तविक भाव गुणवत्ता, मांग और स्थानीय बाजार पर निर्भर करेगा.

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