Tip Of The Day: तिल की फसल में बड़ा खतरा! एक गलती और पकने से पहले बर्बाद हो सकती है पूरी पैदावार – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: तिल की फसल इन दिनों पकाव के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है. इसी दौरान फिल्यूड और पत्ती धब्बा जैसे रोगों का खतरा बढ़ने की आशंका है. कृषि विभाग के अनुसार, इस समय किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए. पत्तियों और फूलों में असामान्य बदलाव दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है.

कृषि विभाग के अनुसार, पकाव के समय तिल की फसल  में फिल्यूड रोग का प्रकोप परेशानी बढ़ा सकता है. इस रोग की स्थिति में पौधों के फूल और पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं और बाद में सूखने की स्थिति बन सकती है. ऐसे लक्षण दिखाई देने पर किसान फसल की तुरंत जांच कराएं. इसी तरह पत्ती धब्बा रोग में पत्तियों पर गहरे रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं. धीरे-धीरे इसका असर पत्तियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. इसका असर फलियों में दाने भरने और उत्पादन पर भी पड़ सकता है.

कृषि विभाग के अनुसार, किसानों को तिल के खेतों  का नियमित और बारीकी से निरीक्षण करना चाहिए. पत्तियों का अचानक पीला पड़ना, सिकुड़ना, मुरझाना या धब्बे दिखाई देना रोग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा पौधों के तने, फूल और फलियों पर भी किसी तरह का असामान्य बदलाव नजर आए तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. शुरुआती स्तर पर समस्या की पहचान होने से फसल को होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. किसान ऐसे लक्षण मिलने पर नजदीकी कृषि अधिकारी या विशेषज्ञ से सलाह ले सकते हैं.

कृषि विभाग के अनुसार, रोग के शुरुआती लक्षण  दिखाई देने पर डाइथोनेट-54 के छिड़काव की सिफारिश की गई है. हालांकि, किसी भी रासायनिक दवा का इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञ की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही करना चाहिए. बिना सलाह के दवा की मात्रा बढ़ाना या गलत तरीके से छिड़काव करना फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए किसान रोग की सही पहचान के बाद ही अनुशंसित दवा का इस्तेमाल करें और छिड़काव के दौरान जरूरी सावधानियों का पालन करें.

कृषि विभाग के अनुसार, तिल की फसल  में जल प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है. बारिश या सिंचाई के बाद खेत में पानी जमा नहीं रहने देना चाहिए. इसके लिए खेत में उचित जल निकासी की व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है. अधिक नमी रहने पर फसल में रोगों का खतरा बढ़ सकता है. पकाव के इस महत्वपूर्ण चरण में किसानों को नियमित रूप से खेत की निगरानी करनी चाहिए. समय पर रोग के लक्षण पहचानकर विशेषज्ञ की सलाह लेने और उचित कृषि प्रबंधन अपनाने से फसल को नुकसान से बचाने में मदद मिल सकती है. इससे तिल की गुणवत्ता और उत्पादन बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी.

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