एग्रीवेट: मध्य पूर्व के देशों में खाद्य सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्गों में बदलाव से भारतीय बासमती चावल की मांग बढ़ सकती है. इससे पंजाब के निर्यातकों और किसानों को बेहतर कमाई का मौका मिल सकता है. निर्यात के ऑर्डर बढ़ने पर स्थानीय मंडियों में धान की कीमतों में भी तेजी आने की संभावना है. दरअसल, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में आ रही दिक्कतों के बीच खाड़ी देशों ने खाद्यान्न की खरीद को लेकर अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है. अब ये देश कम समय के लिए खरीदारी करने के बजाय लंबे समय के आपूर्ति समझौते कर रहे हैं और पहले से चावल खरीदकर भंडार बढ़ा रहे हैं.
मध्य पूर्व के कई देशों में बारिश कम होती है और मीठे पानी के संसाधन भी सीमित हैं. इस वजह से वहां अनाज का उत्पादन जरूरत के मुताबिक नहीं हो पाता. ऐसे में खाद्य भंडार बनाए रखने के लिए ये देश भारत और पाकिस्तान जैसे चावल निर्यातक देशों पर निर्भर रहते हैं. यदि भारतीय बासमती के निर्यात ऑर्डर बढ़ते हैं, तो इसका फायदा पंजाब के किसानों को भी मिल सकता है.
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के बासमती चावल के कुल निर्यात में मध्य पूर्व के देशों की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी है. सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इराक जैसे देश अपनी घरेलू जरूरतों और खाद्यान्न भंडार के लिए भारतीय बासमती चावल पर काफी निर्भर हैं. ईरान में खास तौर पर उसना बासमती चावल की मांग अधिक है. समुद्री माल ढुलाई का खर्च बढ़ने और बंदरगाहों पर देरी से बचने के लिए भारतीय निर्यातक और मध्य पूर्व के बड़े खरीदार अब कंटेनरों के बजाय बड़े जहाजों से चावल भेजने पर जोर दे रहे हैं. इसके तहत थोक में और अलग-अलग खेपों में चावल की ढुलाई की जा रही है. इससे परिवहन लागत और सप्लाई में होने वाली देरी को कम करने में मदद मिल सकती है.
बड़े जहाजों से मध्य पूर्व के देशों में चावल भेजने पर प्रति टन 75 से 100 डॉलर का खर्च आ रहा है. यह कंटेनर से चावल भेजने के मुकाबले काफी सस्ता पड़ रहा है. इससे कारोबारियों को ढुलाई लागत कम करने में मदद मिल रही है. व्यापार से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब, यमन और इराक जैसे देशों में चावल की बड़ी खेप भेजने के लिए अब दूसरे तरीकों से भी माल ढुलाई की जा रही है. ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) के नवनियुक्त उपाध्यक्ष रणजीत सिंह जोसन ने कहा कि इस बदलाव के पीछे केवल भू-राजनीतिक तनाव ही नहीं, बल्कि मध्य पूर्व के देशों की खरीद रणनीति में आ रहा बदलाव भी एक बड़ी वजह है.
मध्य पूर्व के देश अब खाद्यान्न की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित करने और अपने भंडार बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं. वे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में संभावित रुकावटों से होने वाले जोखिम को भी कम करना चाहते हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में अभी दिख रही तेजी का मतलब यह नहीं है कि कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी. भू-राजनीतिक तनाव कम होने, नई फसल की आवक बढ़ने, आयातकों के भंडार दोबारा भरने या समुद्री ढुलाई का खर्च घटने से बाजार का रुख बदल सकता है. वहीं, पंजाब के चावल निर्यातकों के मुताबिक, राज्य में बासमती की खरीद बढ़ी है. इससे मंडियों में किसानों को बेहतर भाव मिल रहा है. पूसा-1509 धान की कीमत पिछले सीजन के औसतन करीब 3,000 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर अब लगभग 4,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है.