एग्रीवेट: सरकार के मक्का से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत 3 रुपये प्रति लीटर घटाने के फैसले से अनाज आधारित डिस्टिलरी कंपनियां नाराज हैं. वहीं, चीनी उद्योग ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है. हालांकि, उद्योग ने इथेनॉल बनाने वाली विशेष इकाइयों को प्राथमिकता देने से बचने की सलाह दी है. इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम शुरू होने के बाद पहली बार तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने मक्के से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत घटाई है. इथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2022-23 में मक्के से बनने वाले इथेनॉल की शुरुआती कीमत कम रखी गई थी. इसके बाद कीमत बढ़ाई गई थी. अब सरकार ने इसमें कटौती की है.
वहीं, इथेनॉल सप्लाई ईयर 2026-27 के लिए C-हैवी शीरे (CHM) से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 57.97 रुपये प्रति लीटर और टूटे चावल से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 64 रुपये प्रति लीटर रखी गई है. इन दोनों की कीमतों में पिछले सप्लाई ईयर के मुकाबले कोई बदलाव नहीं किया गया है. हालांकि, भारतीय खाद्य निगम (FCI) की ओर से बेचे जाने वाले चावल से बनने वाले इथेनॉल की कीमत में 1.82 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है.
इथेनॉल सप्लाई ईयर 2026-27 के लिए सरकार ने गन्ने के रस, सिरप और बी-हैवी शीरे (BHM) से बनने वाले इथेनॉल की कीमतों का ऐलान नहीं किया है. सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि तेल विपणन कंपनियां (OMCs) इन स्रोतों से बने इथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी. इससे पहले 2023-24 में भी गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से इथेनॉल बनाने पर रोक के दौरान सरकार ने इनकी कीमतें नहीं बढ़ाई थीं.
इस बीच, तेल विपणन कंपनियों ने इथेनॉल सप्लाई ईयर 2026-27 (नवंबर से अक्टूबर) के लिए खरीद की पहली निविदा जारी की है. इसके तहत अलग-अलग कच्चे माल से बने कुल 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद की जाएगी. पहली और दूसरी तिमाही में 300-300 करोड़ लीटर, जबकि तीसरी और चौथी तिमाही में 250-250 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने की योजना है.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, अनाज आधारित डिस्टिलरी कंपनियां नेफेड के जरिए मक्के के लिए सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था के पक्ष में नहीं थीं. इसकी वजह यह थी कि जब बाजार में मक्के की कीमत सरकार के तय भाव से कम होती थी, तब ये कंपनियां MSP पर मक्का खरीदने को तैयार नहीं थीं. जानकारों का कहना है कि मक्के से बनने वाले इथेनॉल की कीमत बाजार में मक्के के मौजूदा भाव और उससे इथेनॉल बनने की औसत मात्रा के आधार पर तय की गई थी. ऐसे में मक्के के बाजार भाव घटने पर इथेनॉल की कीमत में कटौती होना भी स्वाभाविक है.
हालांकि, चीनी उद्योग की स्थिति इससे अलग है. चीनी मिलों को गन्ना किसानों को सरकार की ओर से तय उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) देना अनिवार्य होता है. गन्ने का यह मूल्य हर साल बढ़ाया जाता है. ऐसे में चीनी मिलों की लागत बढ़ती रहती है, जबकि मक्का आधारित इथेनॉल की कीमत बाजार भाव के अनुसार घट-बढ़ सकती है.
मक्का की बाजार कीमतें बढ़ने से नुकसान का हवाला देकर अनाज आधारित डिस्टिलरी कंपनियों ने 2022-23 में उत्पादन बंद कर दिया था. इसके बाद सरकार को उसी सीजन के दौरान इथेनॉल की खरीद कीमत दो बार बढ़ानी पड़ी थी. ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के अध्यक्ष सीके जैन ने कहा कि इथेनॉल नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे मक्का और चावल दोनों से इथेनॉल बनाने वाली इकाइयों को फायदा हो. उन्होंने कहा कि दोनों फसलों की लागत अलग-अलग है, इसलिए इथेनॉल की खरीद कीमत भी उनकी लागत के हिसाब से तय होनी चाहिए. साथ ही, कंपनियों को उत्पादन की योजना बनाने के लिए खरीद का भरोसा मिलना चाहिए.