एग्रीवेट: Strawberry Farming Tips: स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के लिए अच्छी कमाई का जरिया बनती जा रही है. इसकी बाजार में अच्छी मांग है और दूसरी फलों की तुलना में इसे अक्सर बेहतर दाम मिल जाते हैं. यही वजह है कि अब हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल के किसान भी स्ट्रॉबेरी की खेती की ओर बढ़ रहे हैं. हालांकि, इस फसल में पानी और खाद का सही संतुलन बनाना काफी जरूरी है. सही प्रबंधन नहीं होने पर पौधों की बढ़त और फल दोनों पर असर पड़ सकता है.
CSK हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के वैज्ञानिकों की तीन साल की एक खेत पर की गई पड़ताल में स्ट्रॉबेरी की पैदावार बढ़ाने के कुछ असरदार तरीके सामने आए हैं. इसमें पानी देने, खाद पहुंचाने और खेत की नमी बचाने के अलग-अलग तरीकों की जांच की गई.
स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़ें ज्यादा गहरी नहीं होतीं और काफी नाजुक रहती हैं. इसके अलावा पौधे से पानी भी तेजी से निकलता है. ऐसे में अगर खेत में नमी कम हो जाए या खाद की मात्रा संतुलित न हो, तो पौधे पर जल्दी असर पड़ सकता है. द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों का कहना है कि, उत्तर-पश्चिम हिमालयी इलाकों में पानी की कमी और मिट्टी की घटती उर्वरता स्ट्रॉबेरी की खेती के सामने बड़ी चुनौती हैं. इसलिए फसल को जरूरत के हिसाब से पानी और पोषक तत्व देना जरूरी है.
पड़ताल में खेत की नमी बचाने के लिए दो तरह की मल्चिंग की तुलना की गई. एक में भूसे का इस्तेमाल हुआ, जबकि दूसरे में पॉलीथीन की परत बिछाई गई. पॉलीथीन मल्च वाले खेत में स्ट्रॉबेरी में फूल और फल आने का समय पहले आया. इसकी पैदावार भूसे वाली मल्च की तुलना में 34.7 फीसदी ज्यादा रही. इतना ही नहीं, पानी के बेहतर इस्तेमाल की क्षमता 81.1 फीसदी बढ़ी और शुद्ध आमदनी 47.4 फीसदी ज्यादा रही. फायदे और खर्च के अनुपात में भी 43.6 फीसदी सुधार देखा गया.
वैज्ञानिकों ने खाद देने के अलग-अलग तरीकों की भी जांच की. इसमें पाया गया कि कुल अनुशंसित नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा का 25 फीसदी हिस्सा शुरुआत में देने और बाकी 75 फीसदी पानी के साथ धीरे-धीरे पौधों तक पहुंचाने से बेहतर नतीजे मिले. इस तरीके से पूरी खाद एक साथ मिट्टी में डालने की तुलना में पैदावार 19.2 फीसदी बढ़ी. पानी के इस्तेमाल की क्षमता 17.9 फीसदी, शुद्ध आमदनी 21.1 फीसदी और फायदे-खर्च का अनुपात 18.6 फीसदी बेहतर रहा. पानी में घुलने वाली खाद को सिंचाई के पानी के साथ सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाने की इस तकनीक को उर्वरक-जल प्रबंधन कहा जाता है. इससे खाद का इस्तेमाल ज्यादा असरदार तरीके से हो सकता है.
सिंचाई की मात्रा का भी फसल पर सीधा असर मिला. वैज्ञानिकों ने अलग-अलग स्तर पर पानी देकर देखा कि सही मात्रा में सिंचाई करने पर सबसे अच्छे नतीजे मिले. जब एक निश्चित मानक के मुकाबले 0.8 स्तर पर सिंचाई की गई, तो 0.4 और 0.6 स्तर की तुलना में फल की पैदावार 43.2 फीसदी बढ़ी. पानी के इस्तेमाल की क्षमता 41.3 फीसदी, शुद्ध आमदनी 16.1 फीसदी और फायदे-खर्च का अनुपात 16.2 फीसदी बेहतर रहा.
पड़ताल में यह भी सामने आया कि पोषण के लिए 50 फीसदी रासायनिक खाद और 50 फीसदी जैविक स्रोतों का मिश्रण देने से फलों की क्वालिटी में सुधार हुआ. इससे फल का वजन बढ़ा और उसमें विटामिन सी तथा घुलनशील ठोस पदार्थ की मात्रा भी बेहतर रही. वैज्ञानिकों का कहना है कि पानी, खाद और मिट्टी की नमी को एक साथ संभालने की यह रणनीति स्ट्रॉबेरी की पैदावार, गुणवत्ता और किसानों की आमदनी तीनों बढ़ाने में मदद कर सकती है. खासकर उन इलाकों में जहां पानी की उपलब्धता सीमित है, यह तरीका खेती को ज्यादा टिकाऊ बनाने में उपयोगी साबित हो सकता है.