एग्रीवेट: Paddy Disease: धान की फसल इस समय पकने की अवस्था में है और बालियों में दाने भरने का काम चल रहा है. ऐसे समय किसानों के लिए फसल में दिखाई देने वाले रोगों की सही पहचान करना बेहद जरूरी है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट धान की फसल में होने वाला जीवाणु रोग है, गेहूं का रोग नहीं. यह मुख्य रूप से धान की बालियों और दानों को प्रभावित करता है. रोग का असर बढ़ने पर दाने ठीक से नहीं भरते, जिससे फसल की पैदावार और दाने की गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं. इसलिए किसान रोग के नाम को लेकर भ्रमित न हों और लक्षण देखकर ही फसल में किसी तरह का उपचार करें.
बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट धान में लगने वाला एक जीवाणु रोग है. इसका असर खास तौर पर बालियां निकलने और दाने बनने की अवस्था में दिखाई दे सकता है. रोग लगने पर धान की बालियों का सामान्य विकास प्रभावित होता है और दाने पूरी तरह नहीं भर पाते. कई बार शुरुआत में इसके लक्षण आसानी से नजर नहीं आते, लेकिन बाद में बालियों और दानों का रंग बदलने लगता है. इससे खेत में दानों की गुणवत्ता और कुल उत्पादन पर असर पड़ सकता है.
इस रोग की पहचान के लिए किसानों को धान की बालियों और दानों पर नजर रखनी चाहिए. प्रभावित दानों का रंग सामान्य दानों से अलग दिखाई दे सकता है. कई बार दाने भूरे या फीके नजर आने लगते हैं और उनका भराव भी सही तरीके से नहीं हो पाता. अगर खेत में ऐसे लक्षण ज्यादा पौधों में दिखाई दें तो रोग का असर बढ़ने की आशंका रहती है. इसलिए बालियां निकलने के बाद किसान नियमित रूप से खेत की निगरानी करते रहें.
बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट नाम सुनकर किसानों को लग सकता है कि यह गेहूं में होने वाला रोग है, लेकिन ऐसा नहीं है. यह मुख्य रूप से धान की फसल से जुड़ा रोग है. गेहूं में इसके बजाय पीला रतुआ, भूरा रतुआ, काला रतुआ, करनाल बंट और ढीला कंडुआ जैसे रोग देखने को मिलते हैं. इसलिए गेहूं की फसल में बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर उसे बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट मानकर दवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
किसी भी फसल में रोग दिखाई देने पर सिर्फ उसके नाम के आधार पर दवा का इस्तेमाल करना सही नहीं है. पहले यह देखना जरूरी है कि बीमारी किस फसल में है और उसके लक्षण क्या हैं. धान की बालियों या दानों में असामान्य बदलाव दिखाई देने पर किसान कृषि विशेषज्ञ या स्थानीय कृषि अधिकारी से सलाह लें. इसी तरह गेहूं में बीमारी दिखाई देने पर उसके लक्षणों के आधार पर सही रोग की पहचान करानी चाहिए. इससे किसान बेवजह दवा खरीदने और इस्तेमाल करने के खर्च से बच सकते हैं और फसल को सही समय पर उचित उपचार मिल सकता है.