किसान पराली जलाने की गलती न करें, इन 3 तरीकों से खाद बनाएं और खेती का खर्च घटाएं—पढ़ें इनसाइड स्टोरी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली का सही प्रबंधन किसानों के लिए बड़ी चुनौती है. कई किसान समय बचाने के लिए पराली जला देते हैं, लेकिन इससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है. ऐसे में किसान पराली को बेकार समझकर जलाने के बजाय उसका इस्तेमाल जैविक खाद बनाने में कर सकते हैं. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, पूसा डीकंपोजर, केंचुआ खाद और मिट्टी पलटने जैसी तकनीकों से फसल अवशेषों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है. इससे खेत की मिट्टी को पोषक तत्व मिलते हैं और खाद पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है.

धान की कटाई के बाद खेत में बची पराली को सड़ाकर खाद  बनाने के लिए पूसा डीकंपोजर का इस्तेमाल किया जा सकता है. यह फसल अवशेषों को तेजी से विघटित करने में मदद करता है. इससे पराली को जलाने की जरूरत कम हो सकती है और खेत में ही जैविक खाद तैयार की जा सकती है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसान पूसा डीकंपोजर का इस्तेमाल करते समय उसके पैकेट पर दिए गए निर्देशों का पालन करें. सही मात्रा में घोल तैयार करके फसल अवशेषों पर छिड़काव करना चाहिए. नमी और मौसम की स्थिति के आधार पर पराली के गलने की प्रक्रिया में समय लग सकता है. उचित प्रबंधन होने पर करीब 15 से 20 दिनों में फसल अवशेष काफी हद तक विघटित हो सकते हैं.

पराली का इस्तेमाल केंचुआ खाद  बनाने में भी किया जा सकता है. इसके लिए खेत के किसी उपयुक्त स्थान पर पराली को इकट्ठा करें और उसमें गोबर का घोल मिलाएं. इसके बाद उचित परिस्थितियों में केंचुए डालकर खाद तैयार की जा सकती है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, केंचुआ खाद मिट्टी की संरचना सुधारने और उसमें जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद करती है. हालांकि, खाद तैयार करने के लिए नमी, हवा और तापमान का संतुलन बनाए रखना जरूरी है. पराली और गोबर के सही मिश्रण से लगभग दो महीने या परिस्थितियों के अनुसार अधिक समय में खाद तैयार हो सकती है. किसान इस खाद का इस्तेमाल अगली फसल में कर सकते हैं, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.

जिन किसानों के खेत में धान  की कटाई के बाद फसल अवशेष बचे रहते हैं, वे मिट्टी पलटने वाले हल की मदद से उन्हें जमीन में मिला सकते हैं. इससे पराली मिट्टी के संपर्क में आती है और नमी व सूक्ष्मजीवों की मदद से धीरे-धीरे विघटित होती है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, यह तरीका उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है, जो अगली फसल की बुवाई से पहले खेत की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि, खेत की नमी, मिट्टी के प्रकार और अगली फसल की बुवाई के समय को ध्यान में रखकर जुताई करनी चाहिए. इससे फसल अवशेषों का प्रबंधन करने के साथ मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है.

पराली जलाने से खेत  में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा, मिट्टी की सतह पर मौजूद जैविक पदार्थ और कुछ पोषक तत्व भी नष्ट हो सकते हैं. धुएं से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसानों को पराली को समस्या मानने के बजाय उसका सही इस्तेमाल करने पर ध्यान देना चाहिए. फसल अवशेषों को खाद में बदलने या मिट्टी में मिलाने से पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में मदद मिलती है. इससे मिट्टी की सेहत बेहतर रखने और खेती की लागत घटाने की संभावना बढ़ती है. इसलिए किसान पराली जलाने के बजाय उपलब्ध संसाधनों के अनुसार इन तीन तरीकों को अपनाकर अगली फसल के लिए खेत तैयार कर सकते हैं.

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