एग्रीवेट: Mushroom Farming: गांव की एक साधारण सी महिला, जो कभी घर के कामकाज तक सीमित थीं, आज अपने दम पर एक ऐसा काम खड़ा कर चुकी हैं, जिससे सिर्फ उनकी जिंदगी नहीं, बल्कि कई दूसरे परिवारों की तस्वीर भी बदल रही है. बिहार के वैशाली जिले की अनिमा देवी ने मशरूम की खेती को अपना सहारा बनाया और देखते ही देखते इसे रोजगार के बड़े जरिये में बदल दिया. आज उनके फार्म में सालभर मशरूम पैदा होता है और गांव की महिलाएं भी उनके साथ जुड़कर अपनी कमाई कर रही हैं.
अनिमा देवी के लिए मशरूम की खेती का सफर सिर्फ एक काम शुरू करने तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने पहले कृषि विभाग और आत्मा वैशाली से इसकी बारीकियां समझीं और फिर पूसा कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लिया. सीखने के बाद उन्होंने तय किया कि अब इसे छोटे स्तर पर नहीं, बल्कि एक यूनिट के तौर पर आगे बढ़ाना है. आज उनके फार्म में बटन मशरूम तैयार होता है. सालभर उत्पादन जारी रखने के लिए उन्होंने एसी चैंबर भी बनाया है. अनिमा बताती हैं कि अलग-अलग चरणों में उत्पादन करने पर एक चक्र में करीब 5 टन तक मशरूम तैयार हो जाता है.
मशरूम की खेती में उत्पादन के साथ उसका बाजार भाव भी काफी मायने रखता है. अनिमा बताती हैं कि, जब मशरूम का अच्छा रेट मिलता है तो कमाई भी बेहतर होती है. वहीं, बाजार भाव गिरने पर आमदनी पर असर पड़ता है. इसके बावजूद उन्होंने इस काम को लगातार आगे बढ़ाया. आज यह यूनिट उनके लिए सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि आसपास के लोगों के लिए रोजगार का साधन भी बन चुकी है.
🍄 मशरूम उत्पादन से बदली किस्मत, आत्मनिर्भर बनीं अनिमा देवी
वैशाली जिले के गौरौल प्रखंड की प्रगतिशील किसान अनिमा देवी ने मशरूम उत्पादन को अपनाकर अपनी मेहनत को नई पहचान दी। कम जगह और सीमित संसाधनों में मशरूम की खेती ने उनके लिए आय का नया जरिया बनाया।
आज अनिमा देवी न सिर्फ खुद आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं। 🌱
मशरूम उत्पादन — नई सोच, नई आय और आत्मनिर्भरता की राह।
@VijayKrSinhaBih
– कृषि विभाग, सरकार। बिहार (@Agribih) 6 अक्टूबर, 2026
मशरूम की यह यूनिट अब सिर्फ अनिमा देवी की कमाई का जरिया नहीं रही, बल्कि आसपास के कई परिवारों के लिए रोजगार का सहारा बन गई है. अनिमा के मुताबिक, यहां करीब 25 से 40 लोग काम कर रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या गांव की महिलाओं की है. कोई मशरूम तोड़ता है, कोई उसे तैयार करता है और कोई पैकिंग की जिम्मेदारी संभालता है.
इस काम से जुड़ी एक महिला बताती हैं कि, पहले रोज काम मिलना आसान नहीं था. कभी एक दिन काम मिलता तो अगले दो दिन घर बैठना पड़ता था. अब हालात बदल गए हैं. मशरूम यूनिट में उन्हें सालभर काम मिल रहा है, जिससे घर की आमदनी में मदद हो रही है. सबसे बड़ी राहत यह है कि काम गांव में ही मिल जाता है, इसलिए बच्चों और परिवार से दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ती.
गौरौल के रहने वाले राहुल कुमार भी इस यूनिट से जुड़े हैं. वह पहले खेतों में मजदूरी करते थे, लेकिन वहां नियमित काम नहीं मिलता था. कई बार काम न मिलने के कारण परिवार चलाने में परेशानी होती थी. मशरूम फार्म शुरू होने के बाद उनकी स्थिति बदली है. अब उन्हें नियमित रूप से काम मिल रहा है. राहुल का कहना है कि इससे उनके परिवार की जिंदगी पहले से बेहतर और खुशहाल हुई है.
अनिमा देवी की इस पहल का असर उनके परिवार तक ही सीमित नहीं रहा. उनके साथ जुड़कर गांव की महिलाएं भी घर के पास काम करके कमाई कर रही हैं. परिवार के सदस्य भी उनके इस काम पर गर्व करते हैं. परिवार के सदस्य ओम प्रकाश शाह बताते हैं कि अनिमा ने पूसा कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लिया और पति के साथ मिलकर मशरूम और कंपोस्ट यूनिट शुरू की. उनके मुताबिक, पहले कई ग्रामीण महिलाएं घर पर ही रहती थीं, लेकिन अब उन्हें सुरक्षित माहौल में काम और कमाई का मौका मिल रहा है.