केमिकल फ्री खेती से लागत घटकर 10 फीसदी बची, माया ने मटर और मक्का उत्पादन से कमाई बढ़ाई—पढ़ें इनसाइड स्टोरी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ते खर्च के बीच प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक विकल्प बनकर उभर रही है. मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की महिला कृषक माया कोरी ने प्राकृतिक खेती अपनाकर खेती की लागत कम करने और मटर के उत्पादन में सुधार की दिशा में प्रयास किए हैं. वे 1.5 एकड़ जमीन पर मटर और मक्का की खेती करती हैं. आत्मा योजना के जरिए उन्हें वित्तीय लाभ और खेती की ट्रेनिंग मिली है, जिससे उनका फसल उत्पादन बेहतर हुआ है और खर्च घटने के साथ ही आमदनी में इजाफा हुआ है.

मध्य प्रदेश के जबलपुर कृषि विभाग के अनुसार जिले के पाटन विकासखंड के ग्राम कोनी कला की महिला कृषक माया कोरी ने 1.5 एकड़ जमीन पर मटर और मक्का की खेती करती हैं. कृषि विभाग की आत्मा परियोजना की संचालक डॉ. इंदिरा त्रिपाठी के मार्गदर्शन में प्राकृतिक खेती की तकनीक सीखकर वे अब स्वयं इनका उपयोग कर रही हैं और गांव के अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित कर रही हैं.

माया कोरी बताती हैं कि पहले वे पारंपरिक तरीके से खेती करती थीं. लगातार रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से खेती की लागत बढ़ रही थी, जबकि उत्पादन और मुनाफे में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही थी. इसी दौरान वे कृषि विभाग की आत्मा परियोजना से जुड़ीं. विकासखंड प्रबंधक शिक्षा श्रीवास्तव और सहायक तकनीकी प्रबंधक सपना साकेत की ओर से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कृषि भ्रमण और संगोष्ठियों में शामिल होकर उन्होंने कृषि अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों से उन्नत खेती की तकनीकों की जानकारी ली. इसके बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाना शुरू किया.

साल 2025-26 में माया कोरी ने प्राकृतिक खेती के क्लस्टर का गठन किया और कृषि सखी के रूप में कार्य करने लगीं. इस दौरान उन्होंने जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी जैसे प्राकृतिक कृषि आदान तैयार करना और उनका उपयोग करना सीखा. मटर की बुवाई के समय वे बीजामृत और जीवामृत का इस्तेमाल करती हैं, जबकि फसल में कीटों के नियंत्रण के लिए आवश्यकतानुसार नीमास्त्र और दशपर्णी का छिड़काव करती हैं.

वह प्राकृतिक कृषि आदानों के उपयोग से फसल में कीट एवं रोगों के प्रकोप को नियंत्रित करने में मदद मिली है. वहीं, रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत में भी कमी आई है. उनका कहना है कि लगातार प्राकृतिक खेती करने से खेत की मिट्टी में सुधार दिखाई दे रहा है और मटर के दानों के आकार में भी वृद्धि हुई है. माया अपने अनुभवों के माध्यम से गांव के अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं. वे किसानों को प्राकृतिक कृषि आदान तैयार करने, उनका सही समय पर उपयोग करने और रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के तरीकों की जानकारी देती हैं.

किसान माया कोरी ने कहा कि पहले उनका खेती का खर्च बहुत ज्यादा था, जो अब घटकर 10 फीसदी ही बचा है. इसके अलावा उन्हें पहले कम उत्पादन और कम भाव मिलता था, लेकिन अब उन्हें ज्यादा उत्पादन के साथ ही फसल की अच्छी कीमत मिल रही है. इससे उनकी आमदनी बढ़ी है और वित्तीय मजबूती मिली है. उन्होंने कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अंतर्गत प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाकर खेती की लागत किया है.

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