एग्रीवेट: Success Story: खेती में लागत कम करने और उपज का बेहतर दाम पाने के लिए किसान अब उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग और सीधे बिक्री पर भी ध्यान दे रहे हैं. गुजरात के 70 वर्षीय किसान कालूभाई पटेल इसका उदाहरण हैं. वह पिछले करीब 13 साल से प्राकृतिक तरीके से हल्दी की खेती कर रहे हैं. अब वह हल्दी को पाउडर और अचार में बदलकर सीधे ग्राहकों को बेचते हैं. इसके लिए उन्होंने घर पर ही पांच लाख रुपये की प्रोसेसिंग यूनिट लगाई, जिस पर बागवानी विभाग से 2.5 लाख रुपये की सब्सिडी मिली है. की रिपोर्ट के मुताबिक, किसान ने प्राकृतिक खेती के साथ अपनी उपज का मूल्य बढ़ाने के लिए प्रसंस्करण का रास्ता अपनाया है.
गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के वडोद गांव के रहने वाले कालूभाई पटेल अपने बेटे के साथ करीब चार एकड़ जमीन पर हल्दी उगाते हैं. वह पिछले लगभग 13 वर्षों से गाय आधारित प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बजाय गोमूत्र आधारित खाद, जीवामृत और अन्य प्राकृतिक तरीकों से तैयार खाद का इस्तेमाल किया है. कालूभाई के मुताबिक, उन्होंने इतने वर्षों में अपने खेत में जहरीले रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया है. उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने के उन्हें सकारात्मक परिणाम मिले हैं. इस तरीके से उनका उद्देश्य खेती की लागत कम करने के साथ मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाए रखना भी है.
कालूभाई केवल कच्ची हल्दी बेचने के बजाय उससे तैयार उत्पाद बनाकर बाजार में उतारते हैं. वह हल्दी को पाउडर और अचार में बदलकर सीधे ग्राहकों को बेचते हैं. इसके लिए उन्होंने अपने घर पर ही प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की है. इस यूनिट में स्टीम बॉयलर, पॉलिशिंग मशीन और हल्दी पाउडर बनाने की मशीन शामिल हैं. इससे उन्हें अपनी उपज की प्रोसेसिंग करने और तैयार उत्पादों की बिक्री का अवसर मिला है. यह तरीका किसानों को केवल कच्ची उपज बेचने के बजाय उससे जुड़े मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने का विकल्प देता है.
#WATCH प्राकृतिक खेती से हल्दी की प्रोसेसिंग तक, गुजरात के किसान बढ़ा रहे हैं अपनी कमाई।
हल्दी की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने में करीब पांच लाख रुपये खर्च हुए. इसमें बागवानी विभाग की ओर से 2.5 लाख रुपये की सब्सिडी दी गई. इस तरह यूनिट की कुल लागत का लगभग आधा हिस्सा सरकारी सहायता से पूरा हुआ. यह मॉडल उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है, जो खेती के साथ खाद्य प्रसंस्करण का काम शुरू करना चाहते हैं. हालांकि, सब्सिडी की राशि और पात्रता संबंधित योजना के नियमों पर निर्भर करती है. इसलिए यूनिट लगाने से पहले किसानों को संबंधित विभाग से योजना की शर्तों की जानकारी लेनी चाहिए.
कालूभाई पटेल को प्राकृतिक खेती और हल्दी उत्पादन में योगदान के लिए तालुका, जिला और राज्य स्तर पर पुरस्कार मिल चुके हैं. कृषि विश्वविद्यालयों ने भी उन्हें सम्मानित किया है. उनके बेटे सुरेशभाई के मुताबिक, लोगों के बीच अच्छी पहचान और सरकारी सहयोग से उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ाने में मदद मिली है. की रिपोर्ट में सरदार कृषिनगर दांतीवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन का भी जिक्र है. इसके मुताबिक, प्राकृतिक खेती के तहत हल्दी की सबसे अधिक पैदावार 40.66 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई, जबकि पारंपरिक खेती में यह 19.3 टन प्रति हेक्टेयर रही. यह अध्ययन में दर्ज आंकड़ा है, इसे हर खेत में मिलने वाली निश्चित पैदावार नहीं माना जाना चाहिए.