एग्रीवेट: चीन में लाखों रुपये की नौकरी, वैज्ञानिक के रूप में स्थापित करियर और बेहतर भविष्य की संभावनाएं—इन सबको पीछे छोड़कर भारत लौटे डॉ. अरुण कुमार पांडेय ने एक ऐसा सपना देखा, जिसमें खेती को नई तकनीक से जोड़ने के साथ महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर भी मिले. आज लखनऊ में स्थापित उनकी टिशू कल्चर लैब इसी सोच की मिसाल बन रही है. टिश्यू कल्चर विधि से वह केले की जी-9 किस्म के लगभग 3 लाख पौधे तैयार कर चुके हैं. अब वह आलू और गन्ने के टिश्यू कल्चर बीज भी तैयार कर रहे हैं. इस पहल की सबसे खास बात यह है कि यहां 12 महिलाएं टिशू कल्चर पौधे तैयार करने से लेकर लैब के संचालन तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
डॉ. अरुण कुमार पांडेय ने सितंबर 2024 में चीन की नौकरी छोड़कर भारत में अपना उद्यम स्थापित करने का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया . प्लांट बायोटेक्नोलॉजी, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, जेनेटिक्स और टिशू कल्चर जैसे क्षेत्रों में अपने अनुभव का इस्तेमाल उन्होंने देश के किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए करने का लक्ष्य रखा.
लखनऊ में प्रोस्पेरा बायोटेक के नाम से टिशू कल्चर लैब स्थापित करने के पीछे उनकी सोच केवल कारोबार खड़ा करना नहीं थी. वे ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहते थे, जिससे किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौधे स्थानीय स्तर पर मिल सकें और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हों.
लैब शुरू होने के बाद उनके सामने प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता एक चुनौती थी. उन्होंने इसका समाधान महिलाओं को प्रशिक्षण देकर निकाला. सामान्य पढ़ाई करने वाली 12 महिलाओं को टिशू कल्चर पौधे तैयार करने की प्रक्रिया सिखाई गई. प्रशिक्षण के बाद इन महिलाओं ने लैब के कामकाज में अपनी भूमिका निभानी शुरू की.
उन्होंने केले की जी-9 किस्म के लगभग तीन लाख टिशू कल्चर पौधे तैयार किए. लेकिन उत्तर प्रदेश के अनेक किसान महाराष्ट्र से पौधे खरीदने के अभ्यस्त थे. ऐसे में स्थानीय स्तर पर तैयार पौधों की गुणवत्ता को लेकर भरोसा कायम करना जरूरी था.
उनके अनुसार, सितंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच लैब का कारोबार लगभग 12 लाख रुपये रहा. वहीं, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक यह बढ़कर करीब 45 लाख रुपये तक पहुंच गया. इस व्यावसायिक वृद्धि के साथ 12 महिलाओं को रोजगार देना उनके उद्यम की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है.
प्रोस्पेरा बायोटेक की लैब में केले की जी-9 किस्म के अलावा सजावटी इनडोर पौधों के उत्पादन पर भी काम किया जा रहा है. एग्लोनेमा की विभिन्न किस्मों जैसे पौधों को तैयार करने का उद्देश्य इन्हें अधिक सुलभ कीमत पर उपलब्ध कराना है.
टिशू कल्चर तकनीक में पौधे के छोटे हिस्से को प्रयोगशाला में पोषक माध्यम पर विकसित करके बड़ी संख्या में नए पौधे तैयार किए जाते हैं. इसके बाद पौधों को बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए हार्डनिंग प्रक्रिया से गुजारा जाता है. सही तकनीक और देखभाल के साथ यह विधि गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तैयार करने में उपयोगी होती है.
डॉ. पांडेय की पहल केले तक सीमित नहीं है. वे आलू और गन्ने की रोपण सामग्री के क्षेत्र में भी संभावनाएं तलाश रहे हैं. उनका प्रयास है कि किसानों को उन्नत पौधों की उपलब्धता के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम करने में मदद मिले.
डॉ. अरुण कुमार पांडेय की कहानी को केवल चीन की नौकरी छोड़कर कारोबार स्थापित करने की सफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा. इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन 12 महिलाओं की भागीदारी है, जिन्हें तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से रोजगार का अवसर मिला.
चीन की नौकरी से भारत में उद्यमिता तक का सफर डॉ. पांडेय के लिए एक बड़ा बदलाव रहा, लेकिन उनकी लैब की पहचान उन महिलाओं के योगदान से भी बन रही है, जो तकनीक के माध्यम से अपनी नई पहचान गढ़ रही हैं.
यह कहानी बताती है कि किसी उद्यम की असली ताकत केवल उसकी कमाई में नहीं, बल्कि उन अवसरों में भी होती है, जिन्हें वह दूसरों के लिए पैदा करता है. लखनऊ की यह टिशू कल्चर लैब इसी सोच के साथ महिला सशक्तीकरण, तकनीकी कौशल और कृषि उद्यमिता को एक साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है.