एग्रीवेट: Kashmir Paddy Crop 2026: कश्मीर घाटी में पिछले कुछ सालों से कभी पानी की कमी तो कभी बाढ़ ने धान किसानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं. कई किसानों को मौसम की मार के कारण फसल का नुकसान उठाना पड़ा. लेकिन इस साल हालात कुछ बेहतर नजर आ रहे हैं. पर्याप्त बारिश और अनुकूल मौसम की वजह से धान की फसल अच्छी रही है. अनंतनाग, कुलगाम, पुलवामा और गांदरबल जैसे प्रमुख धान उत्पादक इलाकों में किसान पिछले साल के मुकाबले ज्यादा उपज की उम्मीद कर रहे हैं.
घाटी के कई इलाकों में इन दिनों धान की कटाई चल रही है. किसानों का कहना है कि लंबे समय बाद खेतों में फसल की स्थिति अच्छी दिख रही है. पुलवामा के वांडनकोरा गांव के किसान मोहम्मद मकबूल के मुताबिक, पिछले साल बाढ़ का पानी खेतों में घुस गया था. इससे खेतों में काफी गाद जमा हो गई थी और कई किसान अपनी फसल तक नहीं काट पाए थे. इस साल ऐसी स्थिति नहीं बनी और फसल भी बेहतर दिखाई दे रही है. ऐसे में किसानों को उम्मीद है कि अच्छी पैदावार का असर उनकी आमदनी पर भी पड़ेगा.
धान की खेती के दौरान पर्याप्त बारिश ने किसानों की मदद की. बारिश से खेतों में पानी की जरूरत पूरी हुई और फसल की बढ़वार के लिए भी मौसम अनुकूल रहा. मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 30 सितंबर के बीच जम्मू-कश्मीर में 530.7 मिलीमीटर बारिश हुई. सामान्य बारिश 549.1 मिलीमीटर रहती है, यानी इस बार कुल बारिश सामान्य से करीब 3 फीसदी ही कम रही. हालांकि, अलग-अलग जिलों में बारिश का आंकड़ा अलग रहा. अनंतनाग में सामान्य से थोड़ी ज्यादा बारिश हुई. पुलवामा में सामान्य से 39 फीसदी और गांदरबल में 20 फीसदी ज्यादा बारिश दर्ज की गई. कुलगाम में बारिश सामान्य से करीब 11 फीसदी कम रही.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, किसान ही नहीं, कृषि विशेषज्ञ भी इस साल धान की फसल को पिछले साल से बेहतर बता रहे हैं. माउंटेन रिसर्च सेंटर फॉर फील्ड क्रॉप्स के एसोसिएट डायरेक्टर ऑफ रिसर्च नजीब उर रहमान सोफी के अनुसार, कई धान उत्पादक इलाकों से अच्छी बढ़वार और ज्यादा उपज की जानकारी मिली है. हालांकि, अभी पूरी तस्वीर सामने आना बाकी है. धान की कटाई पूरी होने और वास्तविक उपज के आंकड़े आने के बाद ही पता चलेगा कि उत्पादन में कितनी बढ़ोतरी हुई है.
अच्छी फसल के बीच कश्मीर घाटी में धान की खेती का क्षेत्र लंबे समय में घटा है. 1980-81 में करीब 1.69 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती थी. 2023-24 में यह घटकर लगभग 1.29 लाख हेक्टेयर रह गया. यानी चार दशक से ज्यादा समय में धान का रकबा करीब 40 हजार हेक्टेयर कम हुआ है. इसके पीछे खेती की जमीन का दूसरे कामों में इस्तेमाल, बढ़ता शहरीकरण और किसानों का दूसरी फसलों की ओर जाना जैसे कारण बताए जाते हैं.
फिलहाल इस साल बेहतर फसल ने कश्मीर के धान किसानों को राहत दी है. अब किसानों की नजरें कटाई पूरी होने के बाद मिलने वाली वास्तविक उपज और मंडी के भाव पर हैं. अगर अच्छी पैदावार के साथ सही भाव मिला, तो इस बार किसानों की कमाई में भी सुधार की उम्मीद बन सकती है.