एग्रीवेट: 22 अक्टूबर 2026, थेनी (तमिलनाडु): थेनी में अंगूर की फसल पर पाउडरी मिल्ड्यू का असर, हेक्साकोनाज़ोल छिड़काव की सलाह – तमिलनाडु के थेनी जिले में अंगूर की फसल पर पाउडरी मिल्ड्यू रोग का प्रकोप देखा गया है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की अक्टूबर माह की कीट-रोग पूर्वानुमान रिपोर्ट में इसकी पुष्टि करते हुए बाग मालिकों को समय रहते छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
पाउडरी मिल्ड्यू एक फफूंद जनित रोग है, जो पत्तियों, नई टहनियों और फलों पर सफेद पाउडर जैसी परत के रूप में दिखाई देता है। अक्टूबर का महीना कई अंगूर उत्पादक इलाकों में प्रूनिंग और नई फ्लश निकलने का समय होता है, जब बेल की कोमल पत्तियां इस रोग के प्रति सबसे ज़्यादा संवेदनशील होती हैं।
विश्वविद्यालय की सलाह के अनुसार पाउडरी मिल्ड्यू के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाज़ोल 5% ईसी का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव किया जा सकता है। इसके विकल्प के रूप में वेटेबल सल्फर 80% डब्ल्यूपी का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से इस्तेमाल करने की सलाह भी दी गई है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि यह छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर कुल तीन बार किया जाए, ताकि रोग पूरी तरह नियंत्रण में आ सके। एक बार छिड़काव करने से रोग पर पूरी तरह काबू पाना मुश्किल होता है, क्योंकि फफूंद के बीजाणु हवा के जरिए दोबारा फैल सकते हैं।
पाउडरी मिल्ड्यू उन इलाकों में ज़्यादा फैलता है जहां दिन और रात के तापमान में ज़्यादा अंतर होता है और हवा में नमी बनी रहती है, जैसा अक्टूबर-नवंबर के महीनों में अक्सर देखने को मिलता है। बेल पर घनी पत्तियां होने और हवा के आवागमन की कमी से भी रोग को फैलने में मदद मिलती है।
इसीलिए विशेषज्ञ बाग की नियमित कटाई-छंटाई करते रहने और बेलों के बीच उचित दूरी बनाए रखने की सलाह भी देते हैं, ताकि हवा का आवागमन बना रहे और पत्तियां जल्दी सूख सकें। समय पर छिड़काव न होने पर पाउडरी मिल्ड्यू अंगूर की गुणवत्ता और उपज दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर निर्यात के लिए तैयार की जा रही फसल में।
विशेषज्ञों के मुताबिक वेटेबल सल्फर का छिड़काव तेज़ धूप या ज्यादा तापमान में करने से पत्तियां झुलस सकती हैं, इसलिए इसे सुबह या शाम के ठंडे समय में ही करने की सलाह दी जाती है। हेक्साकोनाज़ोल का इस्तेमाल करते समय भी छिड़काव का घोल सही मात्रा में ही तैयार करना चाहिए, ताकि बेल को नुकसान न पहुंचे।
फल लगने की शुरुआती अवस्था में अंगूर की बेल इस रोग के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी जाती है, इसलिए किसानों को इस दौर में बाग की बारीकी से निगरानी करने की सलाह दी जाती है। रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही छिड़काव शुरू कर देना बाद में होने वाले बड़े नुकसान से बचा सकता है।
बाग मालिकों को यह भी सुझाव दिया गया है कि छिड़काव की हर तीन खुराक के बाद बाग का निरीक्षण कर यह देखें कि रोग का असर कम हुआ है या नहीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर आगे की रणनीति में बदलाव किया जा सके।