एग्रीवेट: 22 अक्टूबर 2026, गांधीनगर: 70 वर्षीय गुजराती किसान की 13 साल की प्राकृतिक खेती, हल्दी से सालाना अच्छी आमदनी – गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले की वढवाण तालुका के वडोद गांव में रहने वाले 70 वर्षीय किसान कालूभाई पटेल बीते 13-14 साल से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनकी कुल 10 एकड़ ज़मीन में से 4 एकड़ में वे हल्दी उगाते हैं और उसे खुद प्रोसेस कर बेचते भी हैं।
पटेल के मुताबिक उन्हें प्राकृतिक तरीके से हल्दी उगाने की प्रेरणा कागवड़ के एक कृषि मेले में मिली थी, जहां उन्होंने एक और किसान को ऐसा करते देखा था। शुरुआत में उन्होंने अपनी एक एकड़ बंजर ज़मीन पर हल्दी लगाई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर चार एकड़ कर दिया।
वे हल्दी को पानी में उबालने के बजाय भाप में पकाते हैं, जिससे उनके मुताबिक इसके गुण बरकरार रहते हैं। करीब एक महीने सुखाने के बाद हल्दी को साफ कर पीसा जाता है। वे हरी हल्दी का अचार और माउथ फ्रेशनर भी बनाते हैं, जो “शक्ति ऑर्गेनिक” ब्रांड के नाम से बिकते हैं और ज़्यादातर मौखिक प्रचार से ही बिक जाते हैं।
बाजार में कच्ची हल्दी करीब 150 रुपये प्रति किलो बिकती है, जबकि उनका हल्दी पाउडर 350 रुपये और हरी हल्दी का अचार 440 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकता है। पटेल के अपने अनुमान के मुताबिक चार एकड़ हल्दी से उन्हें सालाना करीब 10 से 11 लाख रुपये की आमदनी होती है — यह आंकड़ा किसान का अपना बताया हुआ है।
हल्दी के बाद उसी ज़मीन पर आठ महीने के भीतर वे मूंग, तिल और बाजरा जैसी फसलें भी उगाते हैं। बाकी छह एकड़ में कपास के साथ अरहर की अंतरफसल लगाई जाती है। पटेल बताते हैं कि इस तरीके से खेती करने से उनकी मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़कर 0.94 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
पटेल कहते हैं, “प्राकृतिक खेती प्रकृति है; मिट्टी की देखभाल ही संस्कृति है।” वे अपने खेत में एक स्वचालित बुवाई मशीन भी खुद विकसित कर चुके हैं, जिससे बुवाई का काम आसान हो गया है।
उनके उत्पाद गुजरात ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स सर्टिफिकेशन एजेंसी (GOPCA) से प्रमाणित हैं, जिससे ग्राहकों के बीच भरोसा बना रहता है। पटेल का मानना है कि प्रोसेसिंग का काम खुद करने से किसान को कच्चा माल बेचने के बजाय तैयार उत्पाद का बेहतर दाम मिलता है, जिससे खेती की आमदनी कई गुना बढ़ जाती है।
70 साल की उम्र में भी पटेल खुद खेत और प्रोसेसिंग यूनिट दोनों की देखरेख करते हैं। वे मानते हैं कि प्राकृतिक खेती शुरू करने के शुरुआती दो-तीन साल मुश्किल होते हैं क्योंकि उपज में कुछ कमी आती है, लेकिन मिट्टी की सेहत सुधरने के बाद लंबी अवधि में इसका फायदा मिलता है। उनकी कोशिश अब आसपास के गांवों के किसानों को भी प्राकृतिक खेती और प्रोसेसिंग की तरफ प्रेरित करने की है।