भारी बारिश के बाद धान में गंधी बग और गाल मिज कीट का खतरा, जानें बचाव का तरीका, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 16 अक्टूबर 2026, कटक (ओडिशा): भारी बारिश के बाद धान में गंधी बग और गाल मिज कीट का खतरा, जानें बचाव का तरीका – मानसून की वापसी से पहले हुई भारी बारिश के चलते देश के कई हिस्सों में धान के खेत डूब गए हैं। भाकृअनुप-केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक ने अक्टूबर माह की पहली पखवाड़े की कृषि सलाहकार सेवा जारी करते हुए किसानों को गंधी बग, गाल मिज और थ्रिप्स जैसे कीटों से सतर्क रहने की सलाह दी है।

संस्थान के मुताबिक, कम दबाव के क्षेत्र से हुई लगातार बारिश के चलते कई खेतों में पानी भर गया है। ऐसे मौसम में बादल छाए रहने, नमी ज्यादा होने और दिन में गर्मी व रात में ठंडक रहने से कीट-पतंगों और बैक्टीरिया जनित रोगों के पनपने का खतरा बढ़ जाता है।

रोपाई वाले धान में थ्रिप्स का प्रकोप दिखने पर एजाडिरेक्टिन 0.15 प्रतिशत एक लीटर प्रति एकड़, लैम्ब्डा साइहेलोथ्रिन पांच प्रतिशत ईसी 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ या थायोमेथोक्सम 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 40 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़कने की सलाह दी गई है।

ऊपरी (असिंचित) इलाकों की धान फसल में गंधी बग का प्रकोप प्रति बाली दो कीट या प्रति वर्ग मीटर पांच कीट से ज्यादा दिखने पर मैलाथियान पांच प्रतिशत चूर्ण 10 किलोग्राम प्रति एकड़, एथोफेनप्रॉक्स 10 ईसी 200 मिलीलीटर प्रति एकड़ या क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी 1000 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से इस्तेमाल करने को कहा गया है।

गाल मिज कीट के लिए फिप्रोनिल पांच प्रतिशत एससी 400 से 600 मिलीलीटर प्रति एकड़, थायोमेथोक्सम 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 40 ग्राम प्रति एकड़, लैम्ब्डा साइहेलोथ्रिन पांच प्रतिशत ईसी 100 मिलीलीटर प्रति एकड़, क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ या कार्बोफ्यूरान तीन प्रतिशत सीजी 20 किलोग्राम प्रति एकड़ में से कोई एक दवा 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने की सलाह है।

संस्थान ने तना छेदक और पत्ती लपेटक कीट की निगरानी के लिए प्रति एकड़ चार से पांच फेरोमोन ट्रैप लगाने की भी सलाह दी है, ताकि समय रहते कीट के प्रकोप का पता चल सके। तना छेदक की पहचान के लिए स्किर्पो ल्यूर और पत्ती लपेटक के लिए सीएनाफेलो ल्यूर वाले ट्रैप का इस्तेमाल करने को कहा गया है।

अगर ट्रैप में चार से पांच नर पतंगे एक साथ पकड़ में आने लगें, तो संस्थान ने रासायनिक दवाओं के साथ-साथ जैविक तरीका अपनाने की भी सलाह दी है। तना छेदक के लिए ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम और पत्ती लपेटक के लिए ट्राइकोग्रामा चिलोनिस नाम के मित्र कीट के अंडों वाले कार्ड (एनआरआरआई ट्राइकोकार्ड) का इस्तेमाल किया जा सकता है।

संस्थान के मुताबिक प्रति हेक्टेयर तीन कार्ड, यानी करीब साठ हजार परजीवी अंडे, खेत में पतंगे दिखने के बाद छोड़े जाने चाहिए। जब तक पतंगों की गतिविधि या अंडों के समूह दिखना बंद न हो जाएं, तब तक सात से दस दिन के अंतराल पर पांच बार तक यह कार्ड छोड़े जा सकते हैं। अगर एक हिल (धान के पौधों के गुच्छे) में दो से ज्यादा पत्तियां मुड़ी हुई दिखें, तो वही रासायनिक दवाएं इस्तेमाल की जा सकती हैं, जो तना छेदक के लिए बताई गई हैं।

वहीं देर से रोपी गई धान की फसल में अगर सैनिक सुंडी, केस वर्म या हिस्पा कीट का प्रकोप दिखे, तो क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ या क्विनालफॉस 25 प्रतिशत ईसी 800 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने की सलाह दी गई है। शुरुआती प्रकोप में किसान मिट्टी के तेल का इस्तेमाल कर पौधों के ऊपर रस्सी खींचकर कीट को झाड़ने का परंपरागत तरीका भी अपना सकते हैं।

संस्थान ने किसानों से कहा है कि भूरा फुदका कीट के प्रकोप के दौरान खेत में यूरिया जैसी नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे कीट का प्रकोप और बढ़ सकता है। इसके अलावा खेत में लगातार पानी भरा न रहने दें और बीच-बीच में पानी सुखाने की तकनीक अपनाएं, जिससे भूरा फुदका कीट अपने आप काबू में आ सकता है।

समस्या ज्यादा होने पर किसान पौधे के नमूने लेकर कटक स्थित संस्थान की राइस हेल्थ क्लिनिक में सोमवार से शुक्रवार, सुबह साढ़े दस से दोपहर साढ़े बारह बजे के बीच जांच करा सकते हैं, जहां वैज्ञानिक नमूने देखकर सही सलाह देते हैं।

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