सरकारी नौकरी नहीं मिली तो खेती को बनाया रोजगार, अब रोम में सम्मानित होंगी मिजोरम की ‘स्ट्रॉबेरी वुमन’ – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 26 सितंबर 2026, भोपाल: सरकारी नौकरी नहीं मिली तो खेती को बनाया रोजगार, अब रोम में सम्मानित होंगी मिजोरम की ‘स्ट्रॉबेरी वुमन’ – मिजोरम के दूरदराज गांव की एक महिला ने यह साबित कर दिया है कि रोजगार और आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता नहीं है। लॉन्गतलाई जिले के सांगाउ गांव की 35 वर्षीय जेड टी लालरिथांगी ने स्ट्रॉबेरी की खेती को अपनी आजीविका का आधार बनाकर न केवल आर्थिक सफलता हासिल की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई है। उन्हें खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ओर से ‘FAO 100 Women Heroes in Agrifood Systems and Rural Development’ के लिए चुना गया है।

लालरिथांगी को स्थानीय लोग प्यार से पी मारी-आई के नाम से जानते हैं। यह सम्मान International Year of Women Farmers 2026 के अंतर्गत दिया जा रहा है। उनके अनुसार इस सम्मान के लिए 131 देशों की 600 से अधिक महिलाओं को नामित किया गया था, जिनमें से 100 महिलाओं का चयन किया गया है। भारत की दो महिला किसानों को इस सूची में स्थान मिला है।

लालरिथांगी को 21 सितंबर को ईमेल के माध्यम से उनके चयन की जानकारी मिली। उन्हें सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए इटली के रोम आने का निमंत्रण भी दिया गया है। 12 से 16 अक्टूबर के बीच FAO मुख्यालय में आयोजित होने वाले World Food Forum के दौरान उन्हें यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। फिलहाल वह रोम जाने के लिए आवश्यक दस्तावेज तैयार कर रही हैं। इससे पहले मिजोरम के बागवानी विभाग ने भी उनके चयन की जानकारी साझा की थी। एक हजार पौधों से शुरू हुआ सफर

लालरिथांगी ने वर्ष 2024 में स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की। पड़ोसी सियाहा जिले के कुछ किसानों को स्ट्रॉबेरी की सफल खेती करते देखकर उनके मन में भी इसे आजमाने का विचार आया। उन्होंने शुरुआत में करीब एक हजार पौधे लगाए। सांगाउ गांव से लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित उनके खेत में पहली ही फसल से करीब डेढ़ लाख रुपए की आय हुई।

पहले अनुभव से उत्साहित होकर उन्होंने खेती का विस्तार किया। वर्तमान में लगभग दो हेक्टेयर क्षेत्र में 10 हजार से अधिक स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा वह एवोकाडो, केला और अन्य फल-सब्जियों की खेती भी करती हैं।

वर्ष 2025 में लालरिथांगी ने स्ट्रॉबेरी की खेती से 10 लाख रुपए से अधिक की कमाई की। उनकी विशेषता यह भी है कि वह उत्पाद को केवल ताजा फल के रूप में बाजार में नहीं बेचतीं, बल्कि स्ट्रॉबेरी के एक हिस्से का प्रसंस्करण कर उससे स्ट्रॉबेरी वाइन भी तैयार करती हैं, जिसे स्थानीय बाजार में बेचा जाता है।

उनकी उपलब्धियों को इससे पहले भी पहचान मिल चुकी है। Mizoram Horti Fair 2026 में उन्हें लॉन्गतलाई जिले का सर्वश्रेष्ठ किसान चुना गया था।

शिक्षिका से बनीं सफल किसानखेती को पेशा बनाने से पहले लालरिथांगी एक निजी स्कूल में शिक्षिका थीं। उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए कई प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने नौकरी की तलाश में समय गंवाने के बजाय खेती को अपना करियर बनाने का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया ।

उनका मानना है कि आमदनी और सम्मान के लिए केवल सरकारी नौकरी पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। यदि व्यक्ति मेहनत, लगन और सीखने की इच्छा के साथ किसी काम को अपनाए तो दूसरे क्षेत्रों में भी बेहतर अवसर बनाए जा सकते हैं।

लालरिथांगी के पति परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में सहयोग कर सकते थे, लेकिन वह स्वयं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती थीं। उनका उद्देश्य था कि उनकी शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम बनकर न रह जाए, बल्कि उसका उपयोग अपने पैरों पर खड़े होने के लिए किया जाए। इसी सोच ने उन्हें खेती की ओर प्रेरित किया।

स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू करने से पहले उन्होंने सरकारी सहायता लेने का प्रयास भी किया था। उस समय उन्हें जानकारी दी गई कि स्ट्रॉबेरी की खेती संबंधित विभाग की परियोजना में शामिल नहीं थी। इसके बाद उन्होंने इसे बाधा मानने के बजाय चुनौती के रूप में स्वीकार किया और स्वयं जानकारी जुटाकर खेती शुरू कर दी। बाद में सरकारी विभाग और बागवानी विभाग से उन्हें विभिन्न स्तरों पर सहायता भी मिली।लालरिथांगी की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए केवल खेती की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण भी है कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता की इच्छा, नए प्रयोग और निरंतर मेहनत के माध्यम से गांव में रहते हुए भी व्यापक पहचान बनाई जा सकती है।

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