एग्रीवेट: देश की करीब 30 फीसदी कृषि भूमि पर खेती के साथ सोलर पैनल भी लगाए जा सकते हैं. इससे बिजली उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों को भी फायदा हो सकता है. ये जानकारी केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने दी है. उनके मुताबिक, देश की 16 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से करीब 4.75 करोड़ हेक्टेयर जमीन एग्रीवोल्टिक्स के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त है. एग्रीवोल्टिक्स ऐसी व्यवस्था है, जिसमें खेतों के ऊपर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उसी जमीन पर खेती भी जारी रहती है.
भारत मंडपम में एग्रीवोल्टिक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026 के सातवें संस्करण को संबोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि कहा कि पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण यानी पीएम-कुसुम 2.0 में एग्रीवोल्टिक्स के लिए अलग प्रावधान शामिल किया गया है. इसके जरिए देश में सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों को भी लाभ पहुंचाने की योजना है. उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत दुनिया के सबसे बड़े एग्रीवोल्टिक्स कार्यक्रमों में से एक शुरू किया जाएगा.
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) के अनुमान के मुताबिक, अगर 1.6 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर एग्रीवोल्टिक्स व्यवस्था लागू की जाती है, तो सालाना 12,775 टेरावाट-घंटे (TWh) बिजली पैदा की जा सकती है. यह मात्रा साल 2050 तक भारत की अनुमानित बिजली मांग 5,250 से 10,020 TWh के बराबर या उससे भी ज्यादा हो सकती है. इस व्यवस्था से खेती की जमीन का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए भी किया जा सकेगा. इससे कृषि और सौर ऊर्जा, दोनों क्षेत्रों को बढ़ावा मिलने की संभावना है.
कृषि भूमि पर सोलर पैनल लगाने वाली एग्रीवोल्टिक्स परियोजनाओं की लागत सामान्य सोलर प्लांट के मुकाबले 25 से 30 फीसदी तक ज्यादा हो सकती है. केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि सरकार इस अंतर को कम करने के लिए एग्रीवोल्टिक्स परियोजनाओं को बढ़ावा देगी. इन परियोजनाओं में सोलर पैनल ऊंचे ढांचे पर लगाए जाते हैं, ताकि उनके नीचे खेती भी की जा सके.
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टिक्स से जुड़ी नीतियां बनाते समय छोटे और सीमांत किसानों की जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है. देश के 85 फीसदी से ज्यादा किसान इसी श्रेणी में आते हैं. उन्होंने कहा कि सोलर पैनल लगाने का ऐसा मॉडल होना चाहिए, जिससे खेती बंद न हो और किसान जमीन पर फसल उगाना जारी रख सकें.
शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक, देश में एक किसान के पास औसतन सिर्फ 0.96 हेक्टेयर जमीन है. ऐसे में एग्रीवोल्टिक्स का मॉडल किसानों के लिए व्यावहारिक होना चाहिए. इसका मकसद खेती की जगह सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि दोनों काम एक साथ करना होना चाहिए. फिलहाल पीएम-कुसुम योजना के तहत किसानों को जमीन पर सोलर पैनल लगाने और सोलर पंप खरीदने के लिए सब्सिडी दी जाती है. एग्रीवोल्टिक्स को बढ़ावा मिलने से खेती के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन का विकल्प भी मजबूत हो सकता है.
एग्रीवोल्टिक्स परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए एक नया टूल लॉन्च किया गया है. इसे इंडिया एग्रीवोल्टिक्स अलायंस (IAA) ने तैयार किया है. इस टूल की मदद से किसान पता लगा सकेंगे कि उनकी जमीन पर सोलर पैनल लगाने की कितनी संभावना है और इसे लगाने में कितना खर्च आएगा. सम्मेलन में एग्रीवोल्टिक्स नीति से जुड़ी एक हैंडबुक भी जारी की गई. अधिकारियों के मुताबिक, यह हैंडबुक इस क्षेत्र के लिए अंतिम नीति तैयार करने की दिशा में आधार का काम करेगी. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में मिलने वाले सुझावों और नए विचारों को अंतिम नीति में शामिल करने की योजना है.