एग्रीवेट: रबी सीजन में गेहूं, चना, मसूर और मटर जैसी फसलों की बुवाई शुरू हो गई है. ऐसे में डीएपी खाद की कमी किसानों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है. फसलों की अच्छी बढ़वार और बेहतर उत्पादन के लिए बुवाई के समय सही उर्वरक का इस्तेमाल जरूरी है. अगर किसानों को डीएपी नहीं मिल रहा है, तो वे दूसरे फॉस्फेट उर्वरकों के विकल्प पर विचार कर सकते हैं. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, एसएसपी के साथ यूरिया का इस्तेमाल डीएपी के विकल्प के तौर पर किया जा सकता है, लेकिन खाद की मात्रा फसल की जरूरत और मिट्टी की स्थिति को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए.
रबी सीजन में गेहूं, चना, मसूर, मटर और अरहर जैसी फसलों की बुवाई के समय फॉस्फोरस की जरूरत होती है. डीएपी किसानों के बीच इसका प्रमुख स्रोत है, लेकिन इसकी उपलब्धता कम होने पर दूसरे उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. किसान एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट), एनपीके और अन्य फॉस्फेट उर्वरकों के विकल्पों पर विचार कर सकते हैं. हालांकि, इन सभी उर्वरकों में पोषक तत्वों की मात्रा अलग-अलग होती है. इसलिए डीएपी की जगह किसी दूसरे खाद का इस्तेमाल करते समय उसकी पोषक तत्व क्षमता को समझना जरूरी है.
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, एसएसपी और यूरिया का इस्तेमाल करके फसल को फॉस्फोरस और नाइट्रोजन उपलब्ध कराया जा सकता है. एसएसपी में फॉस्फोरस के साथ सल्फर और कैल्शियम भी मिलता है, जबकि यूरिया नाइट्रोजन की जरूरत पूरी करता है. यही वजह है कि दोनों उर्वरकों का संयोजन कुछ परिस्थितियों में डीएपी के विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकता है. हालांकि, तीन बोरी एसएसपी में 20 किलो यूरिया मिलाने का फॉर्मूला हर फसल के लिए समान रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए. खाद की सही मात्रा फसल, मिट्टी की जांच और प्रति हेक्टेयर पोषक तत्वों की जरूरत के आधार पर तय करनी चाहिए.
रबी फसलों की बुवाई के समय खाद का इस्तेमाल बेसल डोज के रूप में किया जाता है. इससे शुरुआती बढ़वार के दौरान पौधों को जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं. किसान खाद की मात्रा तय करते समय खेत की मिट्टी, फसल की किस्म और सिंचाई की उपलब्धता को ध्यान में रखें. जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से फसल की बढ़वार असंतुलित हो सकती है और लागत भी बढ़ सकती है. इसलिए कृषि विभाग की सलाह या मिट्टी की जांच के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करना बेहतर है.
केवल खाद की मात्रा बढ़ाने से फसल का उत्पादन नहीं बढ़ता. इसके लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल करना चाहिए. चना और मसूर जैसी दलहनी फसलों की खाद संबंधी जरूरत गेहूं जैसी फसलों से अलग होती है. ऐसे में सभी फसलों में एक ही फॉर्मूला अपनाना सही नहीं है. किसानों को डीएपी उपलब्ध नहीं होने पर घबराने के बजाय एसएसपी, एनपीके या अन्य उपयुक्त उर्वरकों के विकल्पों के बारे में कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए. इससे खाद का सही इस्तेमाल करने, खेती की लागत नियंत्रित रखने और फसल की अच्छी पैदावार हासिल करने में मदद मिल सकती है.