एग्रीवेट: Monsoon Deficit: देश में इस साल कमजोर और अनिश्चित मॉनसून का असर अब खेती की लागत पर भी दिखाई देने लगा है. बारिश को लेकर भरोसा कम होने की वजह से किसान खेती में खाद, बीज और कीटनाशकों पर पहले के मुकाबले कम खर्च कर रहे हैं. जब किसानों को फसल की पूरी पैदावार को लेकर भरोसा नहीं होता, तो वे खेती में लगने वाले सामान पर खर्च कम करने लगते हैं. इसका असर खासतौर पर फसल बचाने वाले उत्पादों, खाद और बीज की मांग पर पड़ रहा है.
भारत में जून से सितंबर के बीच होने वाला मॉनसून खेती के लिए बेहद अहम है. देश की सालाना बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा इसी दौरान मिलता है. इस साल बारिश सामान्य से कम और कई इलाकों में अनियमित रही है. द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र से जुड़ी कंपनी रैलिस इंडिया के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेंद्र शुक्ला ने कहा कि, बारिश की कमी का सीधा असर किसानों की फसल पर पड़ सकता है.
ऐसे में किसान पहले यह देखते हैं कि खेत में फसल कितनी अच्छी तरह बढ़ रही है और आगे बारिश की क्या स्थिति रहेगी. अगर मौसम को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो किसान खेती में अतिरिक्त पैसा लगाने से बचते हैं. रैलिस इंडिया के मुताबिक, यही वजह है कि इस साल कृषि में इस्तेमाल होने वाले कई सामान की मांग कमजोर पड़ रही है.
किसानों के खर्च में कमी का असर फसल सुरक्षा से जुड़े उत्पादों पर भी पड़ा है. रैलिस इंडिया ने बताया कि खरपतवार और फसलों में लगने वाले रोगों को रोकने वाली दवाओं की मांग खास तौर पर कमजोर रही है. आमतौर पर किसान फसल की स्थिति और मौसम को देखते हुए कीटनाशक, खरपतवारनाशी और दूसरी दवाओं का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन जब बारिश का भरोसा कम हो, तो किसान जरूरत के हिसाब से ही इन चीजों पर पैसा लगाते हैं. खाद और बीज की खरीद पर भी इसका असर पड़ सकता है. किसानों को अगर अच्छी पैदावार की उम्मीद कम रहती है, तो वे खेती की लागत बढ़ाने वाले खर्चों को सीमित करने की कोशिश करते हैं.
भारत में खरीफ फसलों की बुवाई आमतौर पर जून से शुरू होती है. इसमें धान, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं. इन फसलों के लिए मॉनसून की बारिश काफी महत्वपूर्ण होती है. वहीं, मॉनसून की वापसी के बाद अक्टूबर से गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों की बुवाई शुरू होती है. ऐसे में इस साल खरीफ सीजन के बाद किसान रबी की खेती के लिए भी मौसम की स्थिति पर नजर रखेंगे. अगर बारिश की कमी का असर आगे भी बना रहता है, तो रबी फसलों की तैयारी और खेती में होने वाले खर्च पर भी इसका असर पड़ सकता है.
रिपोर्ट में रैलिस इंडिया ने यह भी कहा है कि कृषि में इस्तेमाल होने वाले सामान का बाजार काफी प्रतिस्पर्धी हो गया है. कंपनियों की संख्या बढ़ने से किसानों के सामने कई विकल्प मौजूद हैं. कंपनी के अनुसार, ऐसे माहौल में नई तकनीक, बेहतर उत्पाद और किसानों के साथ मजबूत साझेदारी रखने वाली कंपनियों के लिए आगे बढ़ने की गुंजाइश ज्यादा होगी.