धान-मक्का की बुवाई में गिरावट, फसल उत्पादन घटा तो खाद्यान्न सप्लाई पर पड़ सकता है असर – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: देश में धान, मक्का और दूसरे अनाजों की बुवाई में कमी आई है. अल नीनो और कम बारिश से फसलों की पैदावार पर असर पड़ने का खतरा है. डन एंड ब्रैडस्ट्रीट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्पादन घटने से खाद्यान्न की सप्लाई, कारोबार की लागत और महंगाई पर असर पड़ सकता है. ऐसे 5 अक्टूबर तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई पिछले साल की तुलना में 1.1 फीसदी कम रही. वहीं, खाद्यान्न फसलों का रकबा 1.6 फीसदी घट गया. रिपोर्ट के अनुसार, बुवाई में यह कमी भले ही कम दिख रही हो, लेकिन धान जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों का रकबा घटने से इस पर नजर रखना जरूरी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि बुवाई के मौजूदा आंकड़े आगे होने वाले उत्पादन में कमी का पक्का संकेत नहीं हैं, बल्कि शुरुआती चेतावनी हैं. फसलों का उत्पादन कितना प्रभावित होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बारिश की कमी, मिट्टी में नमी का घटता स्तर और बढ़ता तापमान फसलों की अहम बढ़वार के दौरान कितने समय तक बने रहते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में धान सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत लोगों को अनाज उपलब्ध कराने में इसकी बड़ी भूमिका है. इसके अलावा, चावल मिलों और पैकेज्ड फूड उद्योग के लिए भी धान महत्वपूर्ण है. 5 अक्टूबर तक धान का रकबा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 3.5 फीसदी कम रहा. ऐसे में धान की बुवाई पर खास नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि इसकी पैदावार में कमी का असर खाद्यान्न की आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, धान की फसल को बढ़वार के ज्यादातर समय पर्याप्त नमी की जरूरत होती है. फसल की पैदावार इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके अहम विकास चरणों में पानी की कितनी उपलब्धता रहती है. इस दौरान नमी की कमी होने से उत्पादन घट सकता है. हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरे क्षेत्रों में फसल की अच्छी स्थिति और सरकारी गोदामों में चावल का पर्याप्त भंडार होने से उत्पादन में मामूली गिरावट का असर संभाला जा सकता है. इससे खाद्यान्न की उपलब्धता, सरकारी खरीद और चावल से जुड़े कारोबार पर तुरंत बड़ा असर पड़ने की आशंका कम हो सकती है.

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अहम बात यह है कि धान के उत्पादन में गिरावट कितनी होती है. अगर सरकारी भंडार और दूसरी आपूर्ति व्यवस्थाएं इस कमी को पूरा नहीं कर पाती हैं, तो बाजार में चावल की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अक्टूबर तक मक्के का रकबा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 2.9 फीसदी कम रहा. मक्के की अहमियत सिर्फ खाद्यान्न तक सीमित नहीं है. इसका इस्तेमाल पोल्ट्री, पशुपालन और मछली पालन के लिए चारा बनाने में होता है. इसके अलावा, स्टार्च, प्रोसेस्ड फूड, शराब और इथेनॉल बनाने में भी मक्का इस्तेमाल किया जाता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मक्के की पैदावार पर फूल आने और दाने बनने के समय नमी की कमी का खास असर पड़ता है. ऐसे में बुवाई पूरी होने के बाद भी बारिश की कमी से उत्पादन घट सकता है.

धान के मुकाबले मक्के की आपूर्ति में कमी का असर कारोबार पर सीधे पड़ सकता है, क्योंकि इसकी मांग का बड़ा हिस्सा उद्योगों और पशु चारा बनाने वाली कंपनियों से आता है. अगर कम पैदावार के कारण बाजार में मक्के की आवक घटती है, तो पोल्ट्री, डेयरी और पशुपालकों के लिए चारे की लागत बढ़ सकती है. इसके अलावा, स्टार्च बनाने वाली कंपनियों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और इथेनॉल उत्पादकों की लागत भी बढ़ सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, कारोबार पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह मक्के की उपलब्धता में कमी और कंपनियों की दूसरे विकल्पों से कच्चा माल जुटाने की क्षमता पर निर्भर करेगा. कंपनियां दूसरे स्रोतों से मक्का खरीदकर या बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालकर इस असर को कम कर सकती हैं.

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