एग्रीवेट: 08 अक्टूबर 2026, भोपाल: बदलते मौसम में चने की बंपर पैदावार: उन्नत किस्म, तकनीक और संपूर्ण फसल प्रबंधन – चना भारत की सबसे प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है और इसे ‘दलहनी फसलों का राजा’ कहा जाता है। उत्तर भारत और मध्य भारत के शुष्क व सिंचित क्षेत्रों में चने की खेती व्यापक पैमाने पर की जाती है। बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में यदि किसान पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक तकनीक, रोग-प्रतिरोधी किस्मों और सही पोषण प्रबंधन का पालन करें, तो वे कम लागत में रिकॉर्ड तोड़ पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
कृषक लाभचने की फसल रबी सीजन की एक मुख्य नकदी फसल है। गेहूं की जगह चने की खेती अपनाने से कम पानी में अधिक मुनाफा मिलता है तथा खेत की मिट्टी की उर्वरता (नाइट्रोजन स्थिरीकरण) भी बढ़ती है।
चने की फसल के लिए ठंडी और शुष्क जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है:• वर्षा एवं नमी: जिन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 60 से 90 सेमी. होती है, वहां इसकी खेती बहुत सफल रहती है।• तापमान: 24°C से 30°C के बीच का तापमान चने के पौधों के विकास के लिए आदर्श माना जाता है।• बुवाई का समय: – सिंचित क्षेत्र: 20 अक्टूबर से 15 नवंबर (सबसे उपयुक्त समय: 25 अक्टूबर से 5 नवंबर) । – असिंचित क्षेत्र: अक्टूबर के द्वितीय पखवाड़े में नमी का लाभ उठाने हेतु। – देर से बुवाई: जी.एन.जी. 2144 जैसी किस्मों से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक बुवाई की जा सकती है।
• बीज की मात्रा: सामान्य देसी चने के लिए 60 किलो/हेक्टेयर; बड़े दाने वाली किस्मों (जैसे सम्राट/जी.एन.जी. 469) हेतु 75-85 किलो/हेक्टेयर तथा काबुली चने हेतु लगभग 100 किलो/हेक्टेयर बीज का प्रयोग करें।• बुवाई की दूरी व गहराई: कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. रखें। सिंचित क्षेत्रों में बीज की गहराई 7 सेमी. रखें। उकसा (विल्ट) प्रभावित क्षेत्रों में बुवाई थोड़ी गहरी (8-10 सेमी.) और देर से करना फायदेमंद रहता है।• जैविक एवं रासायनिक बीज उपचार: बदलते मौसम में कवक (फफूंद) का प्रकोप रोकने के लिए ट्राइकोडर्मा (2.5 किलो प्रति 100 किलो सड़ी गोबर खाद में मिलाकर) या कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम/किग्रा बीज) से उपचारित करें। तत्पश्चात वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु राइजोबियम कल्चर तथा पी.एस.बी. कल्चर से बीज उपचारित करें।
चने की फसल को बहुत ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती। अधिक पानी देने से जड़ सड़न और झुलसा रोग का खतरा बढ़ जाता है
1. प्रथम सिंचाई: बुवाई के 30 से 45 दिन (या 50-55 दिन) बाद, जब पौधों में शाखाएं बन रही हों (फूल आने से ठीक पहले)।2. द्वितीय सिंचाई: फलियों में दाना भरते समय (बुवाई के 90-100 दिन बाद)।सावधानी: फूल खिलने की अवस्था के दौरान कभी भी सिंचाई न करें, इससे फूल झड़ जाते हैं। यदि केवल एक सिंचाई का साधन हो, तो 50-60 दिन पर ही करें।
• आधार खुराक: बुवाई से पहले खेत में 15 टन गोबर खाद या 5 क्विंटल वर्मीकंपोस्ट मिलाएं। इसके साथ 20 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस, 10-12 किलो पोटाश और 10 किलो सल्फर व जिंक सल्फेट दें।• फूटाव (Branching) हेतु: 30-40 दिन की फसल पर एनपीके 19:19:19 या 12:61:00 (1 किलो प्रति एकड़) का पर्णीय छिड़काव करें।• फली भराव अवस्था: दाने का आकार व चमक बढ़ाने के लिए बोरॉन (1 ग्राम/लीटर) या जिबरेलिक एसिड का छिड़काव करें।
बदलते मौसम (असमय बारिश, उमस या तापमान में उतार-चढ़ाव) में मुख्य रूप से फली छेदक इल्ली और उखटा का प्रकोप होता है:
• फेरोमोन ट्रैप: खेत में 10-12 हैलीकोवरपा फेरोमोन कार्ड प्रति हेक्टेयर लगाएं।• पक्षी टी-खूंटी: खेत में जगह-जगह ‘T’ आकार की लकड़ियां गाड़ें ताकि पक्षी बैठकर इल्लियों को खा सकें।• जैविक नियंत्रण: प्रकोप के शुरुआती दौर में नीम का अर्क (50 ग्राम/लीटर) या HNPV (250 LE/हेक्टेयर) का छिड़काव करें।• रासायनिक स्प्रे: अधिक प्रकोप होने पर क्लोरेंट्रानिलिप्रोले (कोराजेन / पेपोरा) 60 मिली प्रति एकड़ की दर से छिड़कें।
• उखटा से बचाव के लिए हमेशा प्रतिरोधी किस्में (जैसे जेजी 14, विशाल, आरवीजी 202) बोएं और बुवाई गहरी करें।• झुलसा/एस्कोकाइटा ब्लाइट दिखने पर मैनकोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
निष्कर्ष एवं सफलता का मूल मंत्रचने की फसल में बेहतर उत्पादन पाने का मूल मंत्र है: रोग-प्रतिरोधी किस्म का चुनाव + अनिवार्य बीज उपचार + फूल आने से पहले हल्की सिंचाई + समय पर फली छेदक इल्ली का जैविक/रासायनिक नियंत्रण। इन नियमों का पालन करने से फसल प्रतिकूल मौसम में भी सुरक्षित रहती है।