एग्रीवेट: 05 नवंबर 2026, महासमुंद (छत्तीसगढ़): लाख की खेती से छत्तीसगढ़ के किसान मिलन सिंह कमा रहे सालाना लाखों रुपये – छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में रहने वाले किसान मिलन सिंह विश्वकर्मा ने परंपरागत धान-दलहन की खेती छोड़कर लाख की खेती को अपनी आय का मुख्य ज़रिया बनाया है। वे 26 एकड़ ज़मीन पर पलाश, बेर और सेमियालाता के पेड़ों पर लाख की खेती करते हैं और इससे सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं।
मिलन सिंह 12वीं तक पढ़े हैं। पहले वे धान और दलहन की पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन बढ़ती लागत और घटते मुनाफे से वे परेशान रहते थे। साल 2002 में भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान, रांची के वैज्ञानिकों का एक दल महासमुंद के दौरे पर आया था। इस मुलाकात ने उनकी सोच बदल दी और उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से लाख की खेती शुरू करने का फैसला किया।
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मिलन सिंह अपने खेतों में लाख की दो प्रमुख किस्मों की खेती करते हैं- कुसुमी और रंगिनी। कुसुमी किस्म को बाज़ार में बेहतर गुणवत्ता का माना जाता है, जबकि रंगिनी किस्म से मुनाफा तो अच्छा मिलता है, लेकिन ऑफ-सीज़न में इसकी देखरेख में ज्यादा मुश्किलें आती हैं।
उनके खेतों में कुसुमी लाख की उपज प्रति एकड़ 6 से 10 क्विंटल तक होती है। रंगिनी किस्म की उपज इससे भी ज्यादा है, खासकर बेर के पेड़ों पर यह 8 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच जाती है। बाज़ार में लाख का भाव करीब 700 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है, जिससे उनकी सालाना आय लाखों रुपये में होती है।
मिलन सिंह अपने खेतों में सिर्फ लाख ही नहीं, बल्कि सब्जी, दलहन और तिलहन की मिश्रित खेती भी करते हैं। इससे उन्हें आय का एक और ज़रिया मिल जाता है और खेत की उर्वरता भी बनी रहती है। उनके इस प्रयास को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित किया जा चुका है। वे एक राष्ट्रीय किसान नेटवर्क से भी जुड़े हैं, जिसके ज़रिए वे दूसरे प्रगतिशील किसानों के साथ अपने अनुभव साझा करते रहते हैं।
लाख की खेती की खासियत यह है कि यह मुख्य रूप से पेड़ों पर आधारित है, जिससे किसान को खेत की ज़मीन अलग से तैयार करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मिलन सिंह के खेतों में पलाश, बेर और सेमियालाता के पेड़ न केवल लाख उत्पादन का आधार बने हैं, बल्कि इनसे मिट्टी और पर्यावरण को भी फायदा पहुंच रहा है।
देश में लाख का इस्तेमाल चूड़ियों, सौंदर्य प्रसाधनों, दवाओं, वार्निश और खाद्य उद्योग में होता है, जिसके चलते इसकी मांग लगातार बनी रहती है। छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में आदिवासी और छोटे किसान परंपरागत रूप से लाख की खेती करते आए हैं, लेकिन मिलन सिंह जैसे किसानों ने वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर इसे बड़े पैमाने पर एक मुनाफे वाले व्यवसाय में बदल दिया है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि लाख की खेती उन इलाकों के लिए खासतौर पर उपयुक्त है, जहां सिंचाई के साधन सीमित हैं, क्योंकि पेड़ आधारित यह फसल सामान्य खेती के मुकाबले कम पानी में भी अच्छी उपज दे सकती है। चूंकि लाख उत्पादन में पेड़ों की कटाई नहीं होती, इसलिए यह जंगल और पर्यावरण बचाने में भी मदद करता है।
मिलन सिंह अब आसपास के गांवों के किसानों को भी इस खेती के बारे में जानकारी देते हैं, ताकि वे भी परंपरागत खेती के साथ-साथ लाख से अतिरिक्त आय कमा सकें। भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान जैसे संस्थान समय-समय पर किसानों को लाख उत्पादन की उन्नत तकनीकों, कीट नियंत्रण और बेहतर पेड़ चुनने की जानकारी देते रहते हैं, जिससे इस व्यवसाय से जुड़े किसानों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है।
लाख उत्पादन की प्रक्रिया भी परंपरागत खेती से अलग है। इसमें किसान पेड़ों की शाखाओं पर लाख के कीड़ों (ब्रूड लाख) को प्राकृतिक रूप से फैलने देते हैं, जो पेड़ के रस को चूसकर अपने शरीर से लाख बनाते हैं। कुछ महीनों बाद शाखाओं से लाख को खुरच कर इकट्ठा किया जाता है और फिर उसे साफ करके बाज़ार में बेचा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में फसल जैसी रोज़मर्रा की देखरेख की ज़रूरत नहीं पड़ती, जिससे किसान एक साथ कई पेड़ों से उत्पादन ले सकते हैं।
मिलन सिंह जैसे किसानों की सफलता यह भी दिखाती है कि कम उपजाऊ या बंजर समझी जाने वाली ज़मीन पर भी, अगर सही पेड़ और तकनीक अपनाई जाए, तो किसान अच्छी आय कमा सकते हैं। आने वाले समय में छत्तीसगढ़ और आसपास के राज्यों में लाख की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दिए जाने की ज़रूरत महसूस की जा रही है, ताकि यह परंपरागत व्यवसाय और ज्यादा किसानों तक पहुंच सके।