एग्रीवेट: भारत ने भविष्य की जरूरत के हिसाब से कोल्ड स्टोरेज क्षमता का 84 फीसदी हिस्सा तैयार कर लिया है. हालांकि, इस क्षमता का बड़ा हिस्सा सिर्फ आलू रखने में इस्तेमाल हो रहा है. वहीं, आधे से ज्यादा कोल्ड स्टोरेज केवल उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में हैं. यह जानकारी FICCI और Grant Thornton Bharat की नई रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो दशकों में कोल्ड स्टोरेज के क्षेत्र में लगातार निवेश हुआ है. इससे देश में भंडारण की मजबूत व्यवस्था तैयार हुई है, जो आगे कोल्ड चेन नेटवर्क को बढ़ाने में मदद कर सकती है. देश में फिलहाल 8,815 कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं में 4.022 करोड़ टन भंडारण क्षमता है. यह 2037-38 तक अनुमानित 4.8 करोड़ टन की जरूरत का करीब 84 फीसदी है.
हालांकि, करीब तीन-चौथाई क्षमता का इस्तेमाल आलू के भंडारण में होता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अब फल-सब्जियों समेत कई तरह की फसलों के लिए मल्टी-कमोडिटी और अलग-अलग तापमान वाली कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित करने की जरूरत है. इन्हें प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के करीब बनाया जाए और बेहतर परिवहन नेटवर्क से जोड़ा जाए.
भारत में कोल्ड स्टोरेज की क्षमता भले ही लंबी अवधि की जरूरत के 84 फीसदी तक पहुंच गई है, लेकिन कोल्ड चेन के दूसरे हिस्सों में अभी बड़ी कमी है. FICCI और Grant Thornton Bharat की रिपोर्ट के मुताबिक, पैक-हाउस की क्षमता तय जरूरत का सिर्फ 0.4 फीसदी, रेफर वाहनों की 3.8 फीसदी और राइपनिंग चैंबर की क्षमता 7.1 फीसदी ही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि खेतों के पास पैक-हाउस जरूरी हैं. यहां फलों और सब्जियों की गर्मी कम करने, उनकी ग्रेडिंग और पैकिंग का काम किया जा सकता है. वहीं, रेफ्रिजरेटेड वाहनों की मदद से उपज को सही तापमान पर बाजार तक पहुंचाया जा सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, ‘इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान’ के तहत पैक-हाउस, रेफर वाहन और राइपनिंग चैंबर बनाने के लिए 2037-38 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी. यानी हर साल औसतन करीब 8,800 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. इस निवेश की जरूरत इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत में हर साल बागवानी, डेयरी, मांस, पोल्ट्री और मछली समेत करीब 1.7 करोड़ से 4.7 करोड़ टन खाद्य पदार्थ बर्बाद होने का अनुमान है. रिपोर्ट के मुताबिक, 54 फसलों में कटाई के बाद होने वाले नुकसान की सालाना कीमत करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये है.
रिपोर्ट में किसानों की उपज को खराब होने से बचाने के लिए खेत के पास प्री-कूलिंग सेंटर, पैक-हाउस और रेफ्रिजरेटेड परिवहन को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है. इसके लिए सरकार को इन सुविधाओं के निर्माण में आर्थिक मदद देने पर जोर दिया गया है. रिपोर्ट में देशभर के लिए एक समान कोल्ड चेन मानक बनाने का सुझाव भी दिया गया है. इसके तहत हर खेप में तापमान का रिकॉर्ड डिजिटल और मशीन से पढ़े जा सकने वाले रूप में दर्ज किया जाए. इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि पूरी सप्लाई चेन के दौरान कहीं तापमान में गड़बड़ी तो नहीं हुई.
इसके अलावा, एक ही कोल्ड स्टोरेज में अलग-अलग फसलों और उत्पादों को रखने की व्यवस्था बढ़ाने की सलाह दी गई है. सालभर इस्तेमाल के लिए समझौते और प्रोसेसर, रिटेलर व निर्यातकों से पहले से खरीद की गारंटी मिलने पर इन सुविधाओं को आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत बनाया जा सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज को खेत के पास की सुविधाओं, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और डिजिटल ट्रैकिंग से जोड़ने से खाद्य पदार्थों की बर्बादी कम होगी, किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और कृषि व खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा.
FICCI लॉजिस्टिक्स कमेटी के चेयरमैन और DP World के CEO एवं एमडी रिजवान सोमर ने बिजनेसलाइन से कहा कि मजबूत कोल्ड चेन सिर्फ कोल्ड स्टोरेज तक सीमित नहीं है. इसमें खेत से लेकर स्टोरेज, परिवहन, वितरण और ग्राहक तक तापमान नियंत्रित व्यवस्था शामिल होनी चाहिए. इसमें बंदरगाह और निर्यात बाजार भी जुड़े होने चाहिए. वहीं, Grant Thornton Bharat के पार्टनर करण शर्मा ने कहा कि भारत में अब कोल्ड स्टोरेज की कमी नहीं है, बल्कि इन्हें आपस में जोड़ने वाली एकीकृत कोल्ड चेन और बेहतर लॉजिस्टिक्स की जरूरत है.