एग्रीवेट: Rabi Sowing: मध्य प्रदेश के किसानों के सामने इस बार रबी की फसल बचाने की चुनौती खड़ी हो सकती है. मॉनसून में कम बारिश के बाद खेतों में नमी की कमी है और अब अल नीनो के असर से सर्दियों का मौसम भी किसानों की चिंता बढ़ा रहा है. इसका असर गेहूं, चना और सरसों जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई और पैदावार पर पड़ सकता है. खासकर मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड के उन इलाकों में परेशानी बढ़ सकती है, जहां खेती काफी हद तक बारिश और मिट्टी में बची नमी पर निर्भर करती है. ऐसे में किसानों के लिए समय पर बुवाई करना, पानी बचाना और फसल का चुनाव सोच-समझकर करना जरूरी हो गया है.
2026 में मॉनसून के दौरान सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश होने की बात कही गई है. इसका असर खरीफ की फसलों के साथ अब रबी की खेती पर भी पड़ सकता है. रबी की फसलों की बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होना जरूरी है, लेकिन बारिश कम होने से कई इलाकों में खेत सूखे हैं.
गेहूं की बुवाई में देरी होने और असिंचित खेतों में इसका रकबा घटने की आशंका है. चने के बीज को अंकुरित होने के लिए मिट्टी में नमी चाहिए. नमी कम रहने पर बीज ठीक से नहीं उग पाते, जिससे पौधों की संख्या और आगे चलकर पैदावार पर असर पड़ सकता है. मालवा और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में चने की खेती करने वाले किसानों को खास सावधानी बरतनी होगी. सरसों की बुवाई पर भी सूखे मौसम और तापमान में बदलाव का असर पड़ सकता है. अगर बुवाई में ज्यादा देरी होती है, तो फसल को आगे चलकर मौसम की मार झेलनी पड़ सकती है.
अल नीनो एक ऐसी मौसमी स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ सकता है. भारत में इसके दौरान मॉनसून की बारिश कम होने का खतरा बढ़ सकता है. अमेरिकी मौसम एजेंसी और विश्व मौसम संगठन के मौसम पूर्वानुमान के मुताबिक, दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच अल नीनो की स्थिति बने रहने की संभावना है. ऐसे में किसानों के लिए तापमान में बदलाव पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि गेहूं जैसी फसलों को दाने बनने और भरने के समय बहुत ज्यादा गर्मी नुकसान पहुंचा सकती है.
गेहूं की फसल को बढ़ने के लिए ठंडा मौसम अनुकूल माना जाता है. अगर सर्दियों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहता है, तो पौधे जल्दी पक सकते हैं. इससे गेहूं को दाने भरने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता और दाने छोटे या हल्के रह सकते हैं. नतीजतन, प्रति हेक्टेयर पैदावार घटने का खतरा रहता है.
इसके अलावा, मालवा और निमाड़ में पानी की कमी किसानों की लागत बढ़ा सकती है. जलाशयों में कम पानी और भूजल स्तर गिरने से सिंचाई के लिए डीजल पंप या दूसरे साधनों पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है. इससे खेती की लागत बढ़ेगी और किसानों की कमाई पर भी असर पड़ सकता है.
मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार खेती की तैयारी करना जरूरी है. किसानों को अपने खेत में उपलब्ध नमी और सिंचाई के साधनों को देखकर फसल चुननी चाहिए. जहां पानी की कमी ज्यादा है, वहां दलहन और सरसों जैसी कम पानी में होने वाली फसलों के विकल्प पर विचार किया जा सकता है. हालांकि, फसल का चुनाव स्थानीय मिट्टी, मौसम और कृषि विभाग की सलाह के आधार पर ही करना बेहतर होगा.