एग्रीवेट: Saffron Farming: कश्मीर की मशहूर केसर की फसल इस समय बेहद अहम दौर से गुजर रही है. सितंबर का महीना केसर की खेती के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इस बार गर्म और सूखे मौसम ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. मौसम में बदलाव के साथ मजबूत होते अल नीनो ने भी हालात को लेकर चिंता बढ़ाई है. केसर की फसल अक्टूबर में फूल आने के दौर में पहुंचती है. उससे पहले सितंबर में जमीन के अंदर मौजूद केसर के कंद यानी पौधे के बल्ब जैसे हिस्सों में अंकुर निकलने लगते हैं. इस समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होना बेहद जरूरी है. अगर मौसम ज्यादा गर्म और सूखा रहा तो कंदों की बढ़त और आगे फूल निकलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर के किसान केसर की खेती के लिए काफी हद तक बारिश पर निर्भर रहते हैं. सितंबर में होने वाली बारिश मिट्टी में नमी बनाए रखने के साथ केसर के कंदों के विकास में मदद करती है. पंपोर के केसर किसान इरशाद अहमद के मुताबिक, इस समय पर्याप्त बारिश फसल के विकास के लिए जरूरी है. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मौसम के बदलते मिजाज का असर केसर की पैदावार पर पड़ा है. किसानों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश होगी, जिससे फसल को जरूरी नमी मिल सके.
किसानों की चिंता सिर्फ बारिश की कमी तक सीमित नहीं है. लंबे समय तक तेज गर्मी और सूखा रहने से कंदों का विकास कमजोर हो सकता है. इसका असर अक्टूबर में आने वाले फूलों और आखिर में मिलने वाली केसर की मात्रा पर पड़ सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, मौसम की मौजूदा स्थिति भी किसानों के लिए ज्यादा राहत देने वाली नहीं है. श्रीनगर स्थित भारत मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक मुख्तार अहमद के मुताबिक कश्मीर के कई इलाकों में दिन का तापमान सामान्य से 2 से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया है. उनके अनुसार गर्म और सूखे हालात कुछ और दिनों तक बने रह सकते हैं. उन्होंने कहा कि अल नीनो का असर मौजूद है, लेकिन इस समय दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की वापसी का दौर भी चल रहा है. इसके चलते कई इलाकों में सूखापन बढ़ रहा है और दिन का तापमान ऊपर जा रहा है.
केसर की खेती को बारिश पर निर्भरता से बाहर निकालने के लिए सरकार ने 2010-11 में राष्ट्रीय केसर मिशन शुरू किया था. इस मिशन के लिए शुरुआत में 400.11 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था. इसके तहत किसानों के खेतों तक सिंचाई की सुविधा पहुंचाने और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई थी. हालांकि, जमीन पर कई किसानों का अनुभव इससे अलग रहा है. कुछ किसानों का कहना है कि कई जगह सिंचाई की पाइप तो बिछाई गईं, लेकिन नियमित पानी की व्यवस्था नहीं हो पाई. कुछ स्थानों पर लगी प्रणालियां अब काम भी नहीं कर रही हैं. ऐसे में किसान अब भी बारिश पर काफी निर्भर हैं.
कश्मीर में केसर की खेती का बड़ा हिस्सा खुले खेतों में होता है और वहां सिंचाई की सीमित सुविधा के कारण सितंबर की बारिश बेहद अहम हो जाती है. अगर आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश होती है तो मिट्टी में नमी बढ़ेगी और कंदों के विकास को सहारा मिल सकता है. लेकिन सूखा लंबा खिंचता है तो किसानों की चिंता बढ़ सकती है. ऐसे में सितंबर का मौसम इस साल की केसर फसल के लिए काफी निर्णायक साबित होगा. अक्टूबर में फूल आने के बाद ही साफ होगा कि मौसम की मार का फसल पर कितना असर पड़ा है.