एग्रीवेट: केंद्र सरकार के खेत बचाओ अभियान और अन्य प्रयासों के चलते जैविक खाद की ओर किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है. 2025 में जैविक खाद का कारोबार 5,287 करोड़ रुपये का रहा है, जो अगले 6 साल में 3 हजार करोड़ से भी ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है. वहीं, वित्त वर्ष 2024 में भारत में 73 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही थी, जो तेजी से आगे बढ़ रही है.
जैविक खाद कारोबार से जुड़े सीईएफ ग्रुप के फाउंडर और सीईओ मनिंदर सिंह नय्यर ने कहा कि आज पंजाब, महाराष्ट्र या तमिलनाडु के किसी खेत में जाएं, तो आपको कुछ बदलाव होता दिखेगा. यूरिया की जानी-पहचानी बोरियों के साथ-साथ, अब ज्यादा किसान वर्मीकम्पोस्ट, कम्पोस्ट और तरल खाद की बोरियां भी रख रहे हैं. जो चीज कभी बहुत कम लोग इस्तेमाल करते थे, वह अब बेहतर मिट्टी, अच्छी फसल और ग्रामीण आय बढ़ाने के लिए एक मुख्य चर्चा का विषय बन गई है.
उन्होंने कहा कि आंकड़े भी इस उम्मीद को सही साबित करते हैं. भारत का जैविक उर्वरक बाजार 2025 में 560 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 5287 करोड़ रुपये ) से बढ़कर 2032 तक 950 मिलियन अमेरिकी डॉलर (8976 करोड़ रुपये) तक पहुंचने का अनुमान है, जो 7.84 फीसदी की CAGR (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) को दर्शाता है. वैश्विक स्तर पर भी स्थिति काफी उत्साहजनक है. इस बदलाव के मूल में एक सरल विचार है कि मिट्टी को पोषण दें, और मिट्टी फसल को पोषण देगी. किसानों को यह बात समझ आ रही है और यही वजह है कि मांग में इजाफा देखा जा रहा है.
मनिंदर सिंह नय्यर ने कहा कि जैविक खाद क्षेत्र को कई तरफ से समर्थन मिल रहा है. वित्त वर्ष 2024 में भारत में 73 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही थी और सरकार समर्थित जैविक खेती क्लस्टर लगातार बढ़ रहे हैं. उत्पादों की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जा रहा है. ‘फर्टिलाइजर (कंट्रोल) ऑर्डर’ के तहत सिटी कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, जैविक खाद और तरल फर्मेंटेड जैविक खाद जैसे उत्पादों के लिए मानक और गुणवत्ता के पैमाने तय किए गए हैं. इससे किसानों को उन उत्पादों पर अधिक भरोसा होता है जिन्हें वे खरीदते हैं.
जैविक खाद के साथ-साथ जैविक इनपुट (biological inputs) का चलन भी बढ़ रहा है. भारत से जैविक खाद्य पदार्थों के बढ़ते निर्यात के कारण प्रमाणित जैविक उर्वरकों की मांग बढ़ रही है. देश और विदेश दोनों जगह खरीदार शुद्ध और सुरक्षित भोजन चाहते हैं, और उनकी यह पसंद सीधे खेतों तक पहुंचती है.
जैविक उर्वरक उत्पादन के जरिए पशुओं के गोबर, फसलों के अवशेष, रसोई के कचरे और शहरी कंपोस्ट को एक मूल्यवान उत्पाद में बदला जा सकता है. सहकारी समितियां, किसान उत्पादक संगठन और छोटे कंपोस्ट प्रोसेसर इसके जरिए स्थानीय स्तर पर व्यवसाय शुरू कर सकते हैं. इससे लोगों को अपने घर के पास ही रोजगार मिल सकता है और कमाई का पैसा गांवों के भीतर ही बना रह सकता है. उदाहरण के लिए, डेयरी क्लस्टर अपने रोजमर्रा के अपशिष्ट (बाय-प्रोडक्ट) को आय के एक अतिरिक्त स्रोत में बदल सकते हैं.
जैविक उर्वरक रातों-रात सभी पारंपरिक कृषि इनपुट की जगह नहीं ले लेंगे, और न ही ऐसा होना जरूरी है. असली अवसर एक संतुलन बनाने में है, जहां जैविक और बायोलॉजिकल इनपुट, रसायनों के कुशल उपयोग के साथ मिलकर काम करें. इससे मिट्टी ऐसी बनेगी जो पीढ़ियों तक उपजाऊ बनी रहेगी. भारत इस बदलाव का नेतृत्व करने के लिए अच्छी स्थिति में है, क्योंकि यहां नीतियों का मजबूत समर्थन है, उपभोक्ताओं की मांग बढ़ रही है और स्थानीय स्तर पर उद्यम विकसित हो रहे हैं.