खेती में 70 फीसदी शारीरिक श्रम महिलाएं कर रहीं, महिला किसानों के लिए नीतियां बनाने की जरूरत – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान अनादिकाल से चला आ रहा है. आज भी खेती में 70 फीसदी शारीरिक श्रम महिलाएं कर रही हैं. भारतीय किसान संघ के महिला सम्मेलन में आरएसएस के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने यह बाते कहीं. उन्होंने कहा कि महिलाएं खेत में बीज बोने से लेकर फसल की कटाई, मड़ाई, देसी बीजों का संरक्षण और पशुपालन तक खेती से जुड़े कार्य कर रही हैं. ऐसे में महिला किसानों के लिए नीतियां बनाने की जरूरत है और इसके लिए महिलाओं को भी नीति निर्माताओं के क्रम में आगे आना होगा. वहीं उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी नीतियों के केंद्र में महिला किसानों को रखना होगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नेता रामलाल ने कहा कि भारतीय किसान संघ के पहले राष्ट्रीय महिला किसान सम्मेलन का आयोजन कृषि क्षेत्र में महिला सशक्तीकरण की अभिव्यक्ति के साथ-साथ कृषि नीतियों में बदलाव का प्रतीक है. रामलाल ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर समेत देशभर से 5,000 महिला किसान और पदाधिकारी बुधवार को यहां इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित अखिल भारतीय महिला किसान कार्यकर्ता सम्मेलन में शामिल होने के लिए अपने खर्चे पर दिल्ली पहुंचे.

उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि व्यवस्था का ताना-बाना अनादि काल से मातृशक्ति के अथक परिश्रम, त्याग व समर्पण पर टिका रहा है. खेत में बीज बोने से लेकर फसल की कटाई, मड़ाई, देसी बीजों का संरक्षण और पशुपालन तक खेती से जुड़े लगभग 60 से 70 फीसदी शारीरिक श्रम को महिलाएं संभालती हैं. इसके बावजूद, सामाजिक संरचना और सरकारी दस्तावेजों में उन्हें केवल ‘खेतिहर मजदूर’ या परिवार की सहयोगी के रूप में ही देखा जाता रहा है.

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026’ की पृष्ठभूमि में आयोजित राष्ट्रीय महिला किसान सम्मेलन केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं, बल्कि भारतीय कृषि में महिलाओं के सशक्तीकरण और नीतियों के पुनर्गठन का नया शंखनाद साबित हुआ है. उन्होंने कहा कि जीएम (GM) बीज और जीन एडिटिंग तकनीक का विरोध भी महिलाओं ने किया है. मौजूदा नीतियां अक्सर कॉरपोरेट और रसायनिक खेती के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण विकास की सफलता नारी शक्ति के हाथ में है. केंद्र व राज्य सरकारों को अपनी नीतियों के केंद्र में महिला किसानों को रखना होगा.

रामलाल ने कहा कि देशी बीजों को लुप्त होने से बचाने वालीं, जैविक मॉडल फार्म तैयार करने वालीं और स्व-रोजगार से अन्य ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाने वाली कृषक नारियों के योगदान को पूरे सम्मान मिलना जरूरी है. उन्हें केवल भूमि पर श्रम करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता व स्वविवेक से पूर्ण निर्णय लेने वाली कृषक और कृषि-उद्यमी के रूप में वैधानिक व सामाजिक मान्यता देनी होगी.

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