कश्मीर में सेब तोड़ना हुआ महंगा, मजदूरों की दिहाड़ी 1,500 रुपये तक पहुंची.. किसानों की बढ़ी चिंता – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: एप्पल Farmers: जम्मू-कश्मीर में सेब की तुड़ाई का सीजन चल रहा है, लेकिन इस बार किसानों की चिंता सिर्फ फसल और बाजार भाव तक सीमित नहीं है. बागों से सेब तोड़ने के लिए उन्हें मजदूरों को पहले के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं. दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में मजदूरों की दिहाड़ी 1,000 से 1,500 रुपये तक पहुंच गई है. पहले यही काम 600 से 650 रुपये रोजाना में हो जाता था. ऐसे में खेती का खर्च बढ़ रहा है और खासकर छोटे किसानों के लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल होता जा रहा है.

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, शोपियां के सेब उत्पादक बशीर अहमद को अपने पांच कनाल के बाग में सेब तुड़वाने के लिए तीन मजदूर रखने पड़े. इसके लिए उन्हें हर मजदूर को 1,300 रुपये रोजाना देने पर सहमत होना पड़ा. मजदूरी तय करने के लिए करीब आधे घंटे तक बातचीत भी करनी पड़ी. बशीर अहमद के मुताबिक, इतनी ज्यादा दिहाड़ी देना किसानों के लिए आसान नहीं है. पहले जिस काम को कम खर्च में पूरा किया जा सकता था, अब उसी पर ज्यादा पैसा लगाना पड़ रहा है. इससे सेब की खेती से होने वाली कमाई पर सीधा असर पड़ रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार, फल मंडी शोपियां के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ वानी के मुताबिक, इस सीजन में मजदूरों की बढ़ती मजदूरी सेब किसानों के लिए बड़ी चिंता बन गई है. कई किसानों को अपनी जरूरत के हिसाब से कम खर्च में मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं. वहीं, सरकार की ओर से मजदूरी की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है. ऐसे में किसान और मजदूर आपस में बातचीत करके दिहाड़ी तय करते हैं. सेब की तुड़ाई के समय मजदूरों की जरूरत अचानक बढ़ जाती है. फल को सही समय पर पेड़ से तोड़कर बाजार तक पहुंचाना जरूरी होता है. देरी होने पर सेब की क्वालिटी पर असर पड़ सकता है. यही वजह है कि किसान ज्यादा मजदूरी देने के बावजूद समय पर मजदूर तलाशने को मजबूर हैं.

श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 में जम्मू-कश्मीर में बागवानी से जुड़े मजदूरों की औसत दिहाड़ी 660.77 रुपये थी. हालांकि, यह आंकड़ा बागवानी के अलग-अलग काम करने वाले मजदूरों का है, सिर्फ सेब तोड़ने वालों का नहीं. इसके मुकाबले, सेब उत्पादकों को अभी 1,000 से 1,500 रुपये रोजाना तक देने पड़ रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में बागवानी रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है. यहां करीब 7 लाख परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्र से जुड़े हैं. हर साल लगभग 20 से 22 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है. ऐसे में मजदूरी बढ़ने का असर बड़ी संख्या में किसानों पर पड़ सकता है.

मजदूरी बढ़ने का सबसे ज्यादा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रहा है. उनके पास खेती पर बढ़ते खर्च को संभालने के लिए ज्यादा पैसे नहीं होते. सेब उत्पादक खुर्शीद अहमद के मुताबिक, स्थानीय मजदूर भी अब ज्यादा दिहाड़ी मांग रहे हैं. वहीं, एक अन्य किसान मीथा गटू ने बताया कि छोटे किसानों को इस बढ़े हुए खर्च का बोझ ज्यादा उठाना पड़ रहा है.

सेब की खेती में खाद, दवा, बाग की देखभाल, तुड़ाई और फल को बाजार तक पहुंचाने पर पहले से ही खर्च होता है. अब मजदूरी बढ़ने से किसानों का कुल खर्च और बढ़ रहा है. अगर बाजार में सेब का अच्छा भाव नहीं मिलता, तो उनके लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है. किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे समय पर फसल की तुड़ाई भी पूरी करें और बढ़ते खर्च के बीच अपनी कमाई भी बचा सकें.

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