एग्रीवेट: पंजाब के बठिंडा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में विकसित और प्रदर्शित की जा रही PR 126 धान की किस्म इसी वजह से चर्चा में है. पंजाब दौरे के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने KVK बठिंडा का अवलोकन किया और इस किस्म की खासियतों की जानकारी ली. उन्होंने बताया कि PR 126 करीब 93 दिन में तैयार हो जाती है. साथ ही, गेहूं की फसल में पर्याप्त DAP देने पर धान में दोबारा DAP की जरूरत नहीं पड़ने की बात कही गई है.
PR 126 की सबसे बड़ी खासियत इसका कम अवधि में तैयार होना है. कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने KVK बठिंडा में इस किस्म का प्रदर्शन देखते हुए कहा कि यह धान 93 दिन में तैयार हो जाती है. कम अवधि की फसल होने का फायदा यह है कि खेत जल्दी खाली हो सकता है और किसान अगली फसल की तैयारी समय पर कर सकते हैं. शिवराज सिंह चौहान ने अपने बताया कि PR 126 के कारण पानी की भी बचत होती है. उनके मुताबिक, इस किस्म में सामान्य व्यवस्था की तुलना में करीब 5-6 सिंचाई कम करनी पड़ सकती है. सिंचाई की संख्या घटने से पानी के साथ बिजली और खेती की लागत में भी बचत होने की संभावना है.
कृषि मंत्री ने KVK में PR 126 के दो प्रदर्शन प्लॉट का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि एक प्लॉट में DAP का इस्तेमाल नहीं किया गया, जबकि दूसरे में DAP दिया गया था. उनके मुताबिक, दोनों में फसल में कोई खास अंतर दिखाई नहीं दिया. उन्होंने कहा कि अगर गेहूं की फसल के दौरान प्रति एकड़ 55 किलो DAP पर्याप्त मात्रा में दिया जा चुका है, तो धान में दोबारा DAP डालने की जरूरत नहीं है. इसका मतलब है कि किसान खरीफ सीजन में DAP की अतिरिक्त लागत से बच सकते हैं. हालांकि, खेत में उर्वरक की जरूरत मिट्टी और फसल की स्थिति पर निर्भर करती है, इसलिए किसान कृषि विशेषज्ञों की सलाह और मृदा परीक्षण के आधार पर ही खाद का इस्तेमाल करें.
पंजाब प्रवास के दौरान बठिंडा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र का अवलोकन किया। यहां पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने धान की PR 126 किस्म विकसित की है। इसकी विशेषता है कि यह 93 दिन में पककर तैयार हो जाती है। गेहूँ के समय पर्याप्त DAP दिए जाने पर धान में दोबारा DAP डालने की आवश्यकता नहीं… pic.twitter.com/GnWZyYzB7b
PR 126 को जल संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बताया जा रहा है. कृषि मंत्री ने कहा कि इस किस्म में 5-6 पानी कम लगेंगे. सिंचाई की जरूरत घटने का सीधा असर ट्यूबवेल और पंप के इस्तेमाल पर पड़ सकता है. इससे बिजली की खपत और सिंचाई से जुड़े खर्च में कमी आने की संभावना है. पंजाब में धान की खेती के दौरान भूजल के इस्तेमाल को लेकर लगातार चर्चा होती रही है. ऐसे में कम अवधि में तैयार होने वाली और कम सिंचाई वाली किस्में किसानों को पानी की बचत के साथ खेती की लागत नियंत्रित करने का विकल्प दे सकती हैं.
बठिंडा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को नई कृषि तकनीकों की जानकारी देने के साथ मृदा परीक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और व्यावसायिक प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराता है. किसानों के साथ ग्रामीण युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों को भी अलग-अलग कृषि गतिविधियों के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है. मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियों के जरिए ग्रामीण परिवारों को खेती के अलावा आय के दूसरे विकल्पों से जोड़ने पर भी जोर दिया जाता है. वहीं, PR 126 जैसी कम अवधि वाली धान किस्म का प्रदर्शन किसानों को पानी, उर्वरक और ऊर्जा के बेहतर प्रबंधन की दिशा में जानकारी देता है. ऐसे प्रयासों का मकसद खेती को अधिक संसाधन-कुशल और लागत प्रभावी बनाना है.