एग्रीवेट: 02 अक्टूबर 2026, यमुनानगर: रासायनिक खेती छोड़ी, अब जैविक तरीके से गेंदा-अरबी उगाकर बंपर मुनाफा कमा रहे हैं यमुनानगर के गुरनाम सिंह – हरियाणा के यमुनानगर जिले के किसान गुरनाम सिंह पहले रासायनिक खाद और कीटनाशकों के सहारे पारंपरिक खेती करते थे। करीब पांच साल पहले उन्होंने यह तरीका पूरी तरह छोड़कर जैविक खेती अपनाई, और आज वे इसी से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
गुरनाम सिंह ने अपनी लगभग तीन एकड़ जमीन पर गेंदे के फूल, अरबी (कोलोकेशिया) और गन्ने की खेती शुरू की। रासायनिक खाद की जगह उन्होंने गाय के गोबर, गोमूत्र और खल से बनी खाद का इस्तेमाल करना शुरू किया।
बदलाव की शुरुआत में उन्हें लगातार सवाल उठता था कि बिना रासायनिक खाद के फसल कैसे होगी, पर उन्होंने धैर्य के साथ अपने खेत को धीरे-धीरे जैविक तरीके में बदला। उन्होंने खुद ही अपने खेत पर देसी खाद बनाना शुरू किया, जिससे बाहर से खाद खरीदने की जरूरत भी कम हुई।
गुरनाम सिंह बताते हैं कि उनके खेत में “गाय का गोबर, गोमूत्र और खल जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।” इसी देसी खाद से मिट्टी की उर्वरता बढ़ी और फसल की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ।
उनका मानना है कि “ऑर्गेनिक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, बल्कि लोगों को बीमारियों से बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।” जैविक तरीके से उगाई गई उनकी फसलों की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग बन गई है, और लोग सीधे उनके खेत से भी उपज खरीदने पहुंचते हैं।
कृषि विभाग की योजनाओं से उन्हें जैविक खेती का प्रशिक्षण, सब्सिडी और जरूरी उपकरण भी मिले, जिससे उनके लिए यह बदलाव आसान हुआ। हालांकि उनकी सालाना आय का सटीक रुपये का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, पर स्थानीय रिपोर्टों में उनके “बंपर मुनाफे” का उल्लेख बार-बार हुआ है।
रासायनिक खेती से जैविक खेती की तरफ मुड़ना गुरनाम सिंह के लिए शुरुआत में आसान नहीं था, क्योंकि उत्पादन में थोड़े समय के लिए कमी भी आई। मिट्टी को रासायनिक असर से मुक्त होने में भी वक्त लगा।
आज गुरनाम सिंह इलाके के दूसरे किसानों को भी जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनकी फसल विविधता- फूल, सब्जी और नकदी फसल का मिश्रण- उन्हें मौसम और बाजार के उतार-चढ़ाव से भी कुछ हद तक सुरक्षा देती है।
यमुनानगर जैसे इलाकों में परंपरागत रूप से गन्ना और गेहूं की खेती ज्यादा होती रही है, इसलिए गेंदे और अरबी जैसी फसलों की तरफ जाना गुरनाम सिंह के लिए एक अलग तरह का प्रयोग भी था। इस बदलाव से उन्हें अपनी आमदनी के स्रोत एक से ज्यादा फसलों में बांटने का मौका मिला, जिससे किसी एक फसल में नुकसान होने पर भी पूरी आमदनी पर असर नहीं पड़ता।
गुरनाम सिंह का कहना है कि जैविक खेती अपनाने के बाद उनकी मिट्टी में कीड़े-मकोड़े और सूक्ष्म जीवों की सक्रियता भी बढ़ी है, जिससे खेत की उर्वरता लंबे समय के लिए बनी रहने की उम्मीद है। वे मानते हैं कि यह तरीका भले ही शुरुआत में धीमा लगे, पर आगे चलकर यह ज्यादा टिकाऊ साबित होता है।