कालाहांडी के आदिवासी किसानों को मिली मछली और झींगा पालन की नई तकनीक की जानकारी – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: 11 अक्टूबर 2026, कालाहांडी (ओडिशा): कालाहांडी के आदिवासी किसानों को मिली मछली और झींगा पालन की नई तकनीक की जानकारी – ओडिशा के कालाहांडी जिले में मछली पालन से जुड़े आदिवासी किसानों और हैचरी मालिकों को कार्प मछली और मीठे पानी के झींगे की उन्नत किस्मों के बारे में सिखाने के लिए एक विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की इकाई केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान, भुवनेश्वर ने यह कार्यशाला जिले के फिनस्पायर हैचरी में करवाई।

कार्यशाला अनुसूचित जनजाति उपयोजना के तहत आयोजित हुई और इसका विषय था सतत जलीय कृषि उत्पादन के लिए कार्प और मीठाजल झींगा की उन्नत किस्में। कालाहांडी जिले के सभी 13 ब्लॉकों से कुल 150 जनजातीय मछली किसान और हैचरी मालिक इस कार्यशाला में शामिल हुए, जिनमें 50 महिला किसान भी थीं।

कालाहांडी जैसे आदिवासी बहुल जिले में ज्यादातर किसान अब भी पुराने, परंपरागत तरीकों से ही तालाबों में मछली पालते हैं, जिससे उत्पादन सीमित रहता है और बीमारी फैलने पर पूरे तालाब का नुकसान हो सकता है। संस्थान का मकसद इन किसानों को वैज्ञानिक तरीके से पालन सिखाकर उनकी उत्पादन क्षमता और आमदनी दोनों बढ़ाना है, ताकि मछली पालन सिर्फ घर के खाने तक सीमित न रहकर एक भरोसेमंद कारोबार बन सके।

संस्थान के वैज्ञानिकों ने किसानों को आनुवंशिक रूप से उन्नत कार्प मछली की किस्मों, उन्नत मीठाजल झींगा पालन और मूल प्रजनन स्टॉक तथा नर्सरी प्रबंधन की सर्वोत्तम पद्धतियों के बारे में बताया। सत्रों में गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, वैज्ञानिक पालन विधियों और सतत जलीय कृषि को लेकर भी जानकारी दी गई।

कार्यशाला में एक किसान-वैज्ञानिक संवाद सत्र भी रखा गया, जिसमें बीज की उपलब्धता, पालन पद्धतियों, रोग प्रबंधन और बाजार के अवसरों पर खुलकर चर्चा हुई। ओडिशा सरकार के मत्स्य विभाग के 10 अधिकारी भी इस दौरान मौजूद रहे।

कालाहांडी जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में मछली पालन कई परिवारों के लिए आय का एक अतिरिक्त और भरोसेमंद जरिया बन सकता है, बशर्ते किसानों को सही तकनीकी जानकारी और गुणवत्तापूर्ण बीज समय पर मिले। जिले के 13 ब्लॉकों से इतनी बड़ी संख्या में किसानों और हैचरी मालिकों का एक साथ आना यह दिखाता है कि इस इलाके में मछली पालन को लेकर किसानों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है।

वैज्ञानिकों ने कार्यशाला में इस बात पर खास जोर दिया कि अच्छी नस्ल का बीज और सही नर्सरी प्रबंधन मिलने भर से भी तालाब की पैदावार में काफी फर्क आ सकता है, भले ही तालाब का आकार और पानी की मात्रा पहले जैसी ही रहे। हैचरी मालिकों को यह भी बताया गया कि गुणवत्तापूर्ण बीज खुद तैयार करने से उन्हें बाहर से बीज मंगाने में होने वाली देरी और लागत, दोनों से राहत मिल सकती है। कुल 150 प्रतिभागियों में से 50 महिला किसानों का शामिल होना इस कार्यशाला की एक खास बात रही।

आनुवंशिक रूप से उन्नत कार्प किस्मों की बढ़वार आम तौर पर सामान्य देसी किस्मों से तेज होती है, जिससे तालाब कम समय में बाजार के लिए तैयार मछली दे पाता है। नर्सरी प्रबंधन के दौरान बीज मछली के शुरुआती दिनों में बचे रहने की दर पर खास ध्यान देना जरूरी माना जाता है, क्योंकि इसी चरण में सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका रहती है। पानी की गुणवत्ता और ऑक्सीजन स्तर की नियमित जांच भी बीज उत्पादन में होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करती है।

कालाहांडी जैसे जिलों में ज्यादातर मछली पालन परिवार के स्तर पर ही होता है, जहां बड़े पैमाने पर आधुनिक उपकरण या बाहर से मंगाई गई तकनीकी सलाह आसानी से नहीं पहुंच पाती। ऐसे में आईसीएआर जैसे संस्थानों के वैज्ञानिकों का सीधे किसानों के बीच पहुंचकर प्रशिक्षण देना इन परिवारों के लिए तकनीकी जानकारी का एक अहम जरिया बन जाता है। अनुसूचित जनजाति उपयोजना के तहत आयोजित इस तरह के कार्यक्रमों का मकसद यही है कि आदिवासी बहुल इलाकों के किसान खेती और पशुपालन के साथ-साथ मछली पालन को भी एक भरोसेमंद अतिरिक्त आमदनी के जरिए के तौर पर अपना सकें।

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