एग्रीवेट: 11 अक्टूबर 2026, रन्नी (केरल): बैंकर की नौकरी छोड़कर पथरीली जमीन पर ड्रैगन फ्रूट उगाकर खड़ा किया 50 लाख रुपये का कारोबार – केरल के रन्नी इलाके में अथिक्कायम गांव के रहने वाले जोसेफ केएस कभी बैंक में नौकरी करते थे। 2016 में रिटायर होने पर उन्होंने अपनी पथरीली और घाटे में चल रही रबर की जमीन पर कुछ नया करने की सोची, और वहां ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगा दिए।
शुरुआत बहुत छोटी थी। उन्होंने आधे एकड़ जमीन पर महज 200 पौधे लगाए थे, और पहले साल उनकी कमाई सिर्फ 50,000 रुपये रही। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपना खेत बढ़ाना शुरू किया, और आज उनकी ड्रैगन फ्रूट की खेती 10 एकड़ में फैल चुकी है, जिसमें करीब 5,000 कंक्रीट के खंभों पर लगभग 20,000 पौधे खड़े हैं।
जोसेफ के लिए रबर की खेती घटते भाव के कारण घाटे का सौदा बन गई थी, इसलिए उन्होंने इसे पूरी तरह बदलने का फैसला किया। उन्होंने अपनी पथरीली जमीन को नुकसान नहीं बल्कि मौका माना, क्योंकि ड्रैगन फ्रूट के पौधों को बहुत उपजाऊ मिट्टी की जरूरत नहीं होती और यह पत्थर जैसी सख्त जमीन में भी अच्छी तरह बढ़ सकता है।
जोसेफ के मुताबिक पिछले साल उनके खेत से करीब 40 टन ड्रैगन फ्रूट निकला, जो 125 से 130 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिका। इस तरह उनका सालाना कारोबार करीब 50 लाख रुपये तक पहुंच गया। उनका कहना है कि अभी उनके कई पौधे पूरी तरह उपज देने की उम्र तक नहीं पहुंचे हैं, और आने वाले वर्षों में प्रति एकड़ करीब 10 टन यानी कुल सौ टन सालाना उपज की उम्मीद है।
ड्रैगन फ्रूट कैक्टस परिवार का पौधा है, जिसे बढ़ने के लिए खंभों जैसे किसी सहारे की जरूरत होती है। बेल जैसी इसकी शाखाएं खंभों पर चढ़ती हैं, और एक ही खंभे पर कई शाखाएं एक साथ उगाई जाती हैं। आम बागवानी फसलों के मुकाबले इसमें पानी की जरूरत भी कम होती है, जिससे पथरीली या कम उपजाऊ जमीन पर भी इसकी खेती मुमकिन हो पाती है।
फल तोड़ने के बाद उसकी ग्रेडिंग और पैकिंग को लेकर खास सावधानी बरती जाती है, क्योंकि ड्रैगन फ्रूट का छिलका नरम होता है और जरा सी लापरवाही से उस पर दाग या चोट के निशान पड़ सकते हैं, जिससे बाजार में उसका भाव घट जाता है। यही वजह है कि जोसेफ के खेत पर काम करने वाले कर्मचारियों को तुड़ाई और पैकिंग के दौरान फल को सावधानी से संभालने की जरूरत पड़ती है, ताकि लंबी दूरी तक भेजे जाने पर भी फल की गुणवत्ता बनी रहे।
शुरुआती दिनों में जोसेफ को पौधों की देखभाल और खाद-पानी के सही तरीके को लेकर काफी कुछ खुद अनुभव से सीखना पड़ा, क्योंकि उस दौर में केरल में ड्रैगन फ्रूट की खेती करने वाले किसान बहुत कम थे। धीरे-धीरे अनुभव बढ़ने के साथ उन्होंने अपने खेत का आकार भी बढ़ाया, और साथ-साथ खंभों व पौधों की संख्या भी बढ़ती चली गई।