एग्रीवेट: Livestock Insurance: गाय, भैंस, बकरी या दूसरे पशुओं को पालना किसानों और पशुपालकों के लिए आमदनी का बड़ा जरिया है. लेकिन अगर बीमारी या किसी हादसे में पशु की मौत हो जाए, तो परिवार को एक झटके में हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है. खासकर दुधारू पशु की मौत होने पर दूध से होने वाली रोज की कमाई भी बंद हो जाती है. ऐसे नुकसान से राहत देने के लिए सरकार की ओर से पशुधन बीमा को बढ़ावा दिया जा रहा है.
पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के मुताबिक, पशु बीमा का मकसद पशु की मौत से होने वाले आर्थिक नुकसान से पशुपालक को सुरक्षा देना है. खास बात यह है कि कई सरकारी योजनाओं में बीमा का पूरा प्रीमियम पशुपालक को अपनी जेब से नहीं देना पड़ता. सरकार प्रीमियम का बड़ा हिस्सा सब्सिडी के तौर पर देती है, जिससे कम खर्च में पशुओं का बीमा कराया जा सकता है.
मान लीजिए किसी किसान की अच्छी नस्ल की गाय या भैंस बीमारी की वजह से मर जाती है. पशु खरीदने में किसान ने जो पैसा लगाया था, उसका बड़ा हिस्सा एक झटके में खत्म हो सकता है. ऐसी स्थिति में अगर पशु का बीमा कराया गया है, तो योजना की शर्तें पूरी होने पर किसान को बीमा राशि मिल सकती है. इससे पशु की मौत के बाद होने वाला आर्थिक नुकसान कुछ हद तक कम हो जाता है. यही वजह है कि पशुपालन विभाग पशुधन बीमा को पशुपालकों की आजीविका की सुरक्षा से जोड़कर देखता है. सरकारी योजनाओं में प्रीमियम पर सब्सिडी भी दी जाती है. कई योजनाओं में सरकार 75 से 85 फीसदी तक प्रीमियम का खर्च उठाती है. ऐसे में पशुपालक को केवल करीब 15 से 25 फीसदी हिस्सा देना पड़ सकता है. कुछ राज्यों में तो पशुपालकों के लिए बीमा की सुविधा मुफ्त भी रखी गई है.
राष्ट्रीय पशुधन बीमा योजना के तहत सामान्य राज्यों में पशुपालक को प्रीमियम का करीब 15 फीसदी हिस्सा देना होता है, जबकि बाकी 85 फीसदी राशि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से सब्सिडी के रूप में दी जाती है. इससे पशुपालकों पर बीमा का खर्च काफी कम हो जाता है. वहीं, राजस्थान में मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना के तहत पशुपालकों को मुफ्त बीमा कवरेज देने की व्यवस्था बताई गई है. इसमें अधिकतम दो दुधारू पशु यानी गाय या भैंस के साथ भेड़, बकरी और ऊंट का भी बीमा किया जाता है. सरकारी योजनाओं के अलावा निजी बीमा कंपनियां भी पशुधन बीमा देती हैं. इन पॉलिसियों में बीमारी, दुर्घटना और कुछ मामलों में सर्जरी जैसी स्थितियों को भी कवर किया जा सकता है. हालांकि, इसका लाभ संबंधित पॉलिसी की शर्तों के आधार पर मिलता है.
बीमा में मिलने वाली राशि हर पशु के लिए एक जैसी नहीं होती. यह पशु की प्रजाति, नस्ल, कीमत और संबंधित योजना के नियमों पर निर्भर करती है. पशुपालन विभाग के अनुसार, गाय और भैंस के लिए अलग-अलग योजनाओं में करीब 40,000 से 60,000 रुपये तक का बीमा कवर मिल सकता है. बैल और ऊंट के लिए भी योजना के अनुसार लगभग इतनी ही राशि का कवर हो सकता है. वहीं, भेड़ और बकरी के लिए करीब 4,000 से 15,000 रुपये प्रति पशु तक बीमा राशि मिलने का प्रावधान अलग-अलग योजनाओं में बताया गया है. कुछ योजनाओं में अगर पशु की स्थायी विकलांगता हो जाती है, तो भी बीमा राशि का 75 फीसदी तक भुगतान किए जाने का प्रावधान हो सकता है. हालांकि, किसी भी क्लेम से पहले संबंधित योजना की शर्तों को देखना जरूरी है.
पशु का बीमा कराने के लिए सिर्फ प्रीमियम जमा करना ही काफी नहीं होता. पशु की पहचान और स्वास्थ्य से जुड़े दस्तावेज भी जरूरी होते हैं. इनमें सबसे अहम कान में लगाया गया टैग है. इस टैग के जरिए बीमा किए गए पशु की पहचान की जाती है और बाद में क्लेम के समय भी इसका इस्तेमाल होता है. इसके अलावा पशु का स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र भी मांगा जा सकता है. इसलिए बीमा कराने से पहले पशुपालक को यह जरूर देख लेना चाहिए कि पशु की टैगिंग और जरूरी दस्तावेज पूरे हैं या नहीं. सरकार पशुधन से जुड़े रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने पर भी काम कर रही है. इसके लिए भारत पशुधन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है. पशुपालन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, इसमें पशु प्रबंधन, स्वास्थ्य, प्रजनन और टैग प्रबंधन से जुड़े अलग-अलग मॉड्यूल शामिल हैं.