एग्रीवेट: 30 सितंबर 2026, पिंगला (पश्चिम मेदिनीपुर), पश्चिम बंगाल: पश्चिम बंगाल के सुब्रत महेश ड्रैगन फ्रूट से कमा रहे सालाना 12.5 लाख रुपए से ज्यादा – पश्चिम मेदिनीपुर जिले के पिंगला ब्लॉक स्थित गो-गराम गांव के किसान सुब्रत महेश ने करीब 13 साल पहले सिर्फ चार खंभों (पोल) से ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की थी। आज उनके एक एकड़ खेत में 550 खंभों पर ड्रैगन फ्रूट की बेलें लहलहा रही हैं।
क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सुब्रत अपने खेत में ड्रैगन फ्रूट की कई किस्में उगाते हैं, जिनमें पीली, बैंगनी, वियतनाम हाइब्रिड और इज़राइल लेमन किस्में शामिल हैं। अलग-अलग किस्मों की बुआई से उन्हें साल भर अलग-अलग मौसम में फल मिलते रहते हैं, जिससे बाज़ार में लगातार आपूर्ति बनी रहती है।
शुरुआत में एक एकड़ खेती के लिए उन्हें करीब सात लाख रुपए का निवेश करना पड़ा था। इसमें खंभों की खरीद, सीमेंट के आधार, पौध और शुरुआती देखभाल का खर्च शामिल था, जो सामान्य सब्जी की खेती के मुकाबले काफी ज्यादा है।
आज सुब्रत की सालाना आय 12.5 लाख रुपए से ज्यादा हो चुकी है, यानी औसतन एक लाख रुपए प्रति माह से अधिक। यह आमदनी सिर्फ फल बेचने से नहीं, बल्कि पौध और चारा (कलम) की बिक्री से भी आती है, जिसकी मांग आसपास के इलाकों में लगातार बढ़ रही है।
रिपोर्ट में सुब्रत के हवाले से बताया गया है कि ड्रैगन फ्रूट के निर्यात की भी अच्छी संभावना है। मूल बयान बांग्ला भाषा में दिया गया था और यहां उसका भावार्थ हिंदी में प्रस्तुत किया गया है। उनका मानना है कि सही पैकेजिंग और भंडारण सुविधा मिलने पर यह फल दूसरे राज्यों और विदेशी बाज़ारों तक भी आसानी से पहुंचाया जा सकता है।
ड्रैगन फ्रूट कैक्टस प्रजाति का फल है, जिसे धान या सब्जियों जैसी पारंपरिक फसलों के मुकाबले काफी कम पानी की ज़रूरत होती है। एक बार बेलें जड़ पकड़ लें तो यह पौधा 15-20 साल तक फल देता रह सकता है, जिससे शुरुआती निवेश के बाद सालों-साल खाद-पानी पर होने वाला खर्च अपेक्षाकृत कम रहता है। शहरी बाजारों में इसकी बढ़ती मांग और अच्छे दाम के चलते बंगाल सहित कई राज्यों के किसान अब परंपरागत खेती के साथ-साथ इसे भी आज़मा रहे हैं।
सुब्रत की कहानी धैर्य और निरंतरता की मिसाल है। चार खंभों से शुरू हुआ प्रयोग आज 550 खंभों तक पहुंच चुका है, जो दिखाता है कि नई फसल में शुरुआती निवेश भले ही ज्यादा लगे, लेकिन सही देखभाल के साथ यह लंबे समय में स्थिर और अच्छी आमदनी का जरिया बन सकती है। उपलब्ध रिपोर्ट में इस खेती में किसी सरकारी योजना या सब्सिडी के इस्तेमाल का जिक्र नहीं है, इसलिए इसे शामिल नहीं किया गया है।