एग्रीवेट: 30 सितंबर 2026, भोपाल: मध्य प्रदेश में फसल अवशेष प्रबंधन यंत्रों पर 50% सब्सिडी, 6 अक्टूबर आवेदन की अंतिम तारीख – मध्य प्रदेश सरकार फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़े कृषि यंत्रों की खरीद पर किसानों को अधिकतम 50 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है। यह सब्सिडी कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की “ई-कृषि यंत्र अनुदान” योजना के तहत उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि किसान पराली जलाने के बजाय फसल अवशेष का वैज्ञानिक प्रबंधन कर सकें।
इस योजना में जिन यंत्रों को शामिल किया गया है उनमें बेलर, मल्चर, रोटोकल्टीवेटर, स्लेशर, हे रेक, स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) और पैडी राइस ट्रांसप्लांटर शामिल हैं। वास्तविक सब्सिडी राशि यंत्र की स्वीकृत लागत और आवेदक किसान की श्रेणी — छोटा, सीमांत या सामान्य — पर निर्भर करेगी।
छोटे और सीमांत किसानों को आमतौर पर सामान्य श्रेणी के किसानों की तुलना में ज्यादा प्रतिशत अनुदान मिलने का प्रावधान रहता है, ताकि महंगे यंत्र खरीदना उनकी पहुंच में आ सके। यह योजना हर साल खरीफ कटाई के बाद खुलती है, जब रबी बुआई से पहले खेत तैयार करने की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है।
इच्छुक किसानों को कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय के e-krishi yantra anudan पोर्टल, farmer.mpdage.org, पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। खंडवा सहित कुछ जिलों में आवेदन की विंडो 24 सितंबर से खुल चुकी है और 6 अक्टूबर 2026 तक चलेगी।
आवेदन के लिए किसानों के पास एग्री-स्टैक फार्मर आईडी, आधार कार्ड, बैंक पासबुक, भूमि दस्तावेज़ (बी-1 खसरा) और संबंधित जिले के सहायक कृषि अभियंता के नाम धरोहर राशि का बैंक ड्राफ्ट होना अनिवार्य है। आवेदन की अंतिम तारीख के अगले ही दिन, यानी 7 अक्टूबर 2026 को, सभी पात्र आवेदनों में से लॉटरी निकाली जाएगी।
लॉटरी में चयनित होने वाले किसानों को यंत्र किसी भी दुकान से नहीं, बल्कि विभाग द्वारा अधिकृत विक्रेता से ही खरीदना होगा, तभी उन्हें सब्सिडी राशि का लाभ मिलेगा। योजना से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए किसान अपने ब्लॉक या जिला कृषि कार्यालय अथवा सहायक कृषि अभियंता कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
यह योजना ऐसे समय आई है जब रबी सीजन से पहले खेतों की सफाई और फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर किसानों पर दबाव बढ़ जाता है, और कई इलाकों में पराली जलाने की घटनाएं सामने आती हैं। खरीफ फसल कटने के बाद खेत को जल्द से जल्द रबी बुआई के लिए तैयार करने की जल्दबाजी में कई किसान अवशेष जला देते हैं, जिससे न सिर्फ मिट्टी की उर्वरता घटती है बल्कि आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण भी बढ़ता है। सर्दियों की शुरुआत में उत्तर भारत के कई शहरों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के पीछे भी पराली जलाना एक बड़ा कारण माना जाता रहा है।
बेलर और मल्चर जैसे यंत्रों की मदद से किसान फसल अवशेष को खेत में ही काटकर मिट्टी में मिला सकते हैं या उसकी गांठ बनाकर बेच भी सकते हैं, जिससे अतिरिक्त आमदनी की भी गुंजाइश बनती है। स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) जैसे उपकरण कंबाइन हार्वेस्टर के साथ जुड़कर कटाई के दौरान ही अवशेष का बारीक प्रबंधन कर देते हैं, जिससे अलग से जलाने या हटाने की ज़रूरत काफी हद तक कम हो जाती है।