हिमाचल में प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को मिले 6.87 करोड़ रुपये, गेहूं-मक्का पर सबसे ज्यादा MSP – एग्रीवेट

atulpradhan
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एग्रीवेट: 19 सितंबर 2026, शिमला: हिमाचल में प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को मिले 6.87 करोड़ रुपये, गेहूं-मक्का पर सबसे ज्यादा MSP – हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को बीते वित्त वर्ष में समर्थन मूल्य (एमएसपी) के जरिए 6.87 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है। राज्य के कृषि मंत्री चंद्र कुमार ने 13 सितंबर को यह जानकारी देते हुए बताया कि यह राशि गेहूं, मक्का, कच्ची हल्दी और पांगी घाटी की जौ की खरीद पर दी गई।

विभागीय आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में गेहूं पर 3.44 करोड़ रुपये, मक्का पर 2.11 करोड़ रुपये, कच्ची हल्दी पर 1.25 करोड़ रुपये और चंबा जिले की पांगी घाटी में उगने वाली जौ पर करीब 6 लाख रुपये किसानों को दिए गए। यह पूरा भुगतान जिलावार खरीद केंद्रों के जरिए सीधे किसानों के बैंक खातों में पहुंचाया गया है।

हिमाचल में प्राकृतिक खेती का मतलब है बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक के, गोबर-गोमूत्र आधारित जीवामृत व बीजामृत जैसी देसी विधियों से खेती करना। राज्य सरकार इसे सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती पद्धति पर आधारित बताती है और कृषि विस्तार सुधारों के लिए चल रही एटीएमए योजना के जरिए भी किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता है।

राज्य सरकार के मुताबिक 31 जुलाई 2026 तक हिमाचल में 2,68,128 किसान प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं, जिनमें से 5,523 किसानों को इस साल एमएसपी खरीद का सीधा फायदा मिला है। यह काम राज्य की प्रमुख योजना “राज्य प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना” और केंद्र की राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत हो रहा है।

कृषि मंत्री चंद्र कुमार ने कहा कि प्राकृतिक तरीके से उगाए गए गेहूं, मक्का और पांगी घाटी की जौ पर एमएसपी देने से किसानों को रासायनिक खेती छोड़ने का सीधा आर्थिक प्रोत्साहन मिल रहा है। सरकार का दावा है कि देश में प्राकृतिक उपज पर सबसे ऊंचा समर्थन मूल्य फिलहाल हिमाचल में ही दिया जा रहा है।

राज्य सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अदरक को भी एमएसपी सूची में शामिल करने को मंजूरी दे दी है। इससे पांगी और आसपास के पहाड़ी इलाकों के अदरक उत्पादकों को भी अब बाजार में औने-पौने दाम की जगह तय न्यूनतम कीमत मिलेगी। अब तक इन किसानों को स्थानीय व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता था, जो मांग कम होने पर अक्सर बहुत कम दाम देते थे।

खरीद केंद्रों पर किसानों को उपज बेचने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है, जिसके बाद तय दर पर सीधे भुगतान बैंक खाते में किया जाता है। कृषि विभाग जिलावार खरीद केंद्रों की सूची और भुगतान का ब्योरा अपनी वेबसाइट पर जारी करता है।

कृषि विभाग के मुताबिक ऊंचाई वाले इलाकों में सामान्य फसलों के मुकाबले प्राकृतिक तरीके से उगाई गई फसल की पैदावार शुरुआती वर्षों में कुछ कम रहती है, लेकिन एमएसपी की गारंटी और खाद-दवा पर होने वाला खर्च बचने से किसानों की शुद्ध आमदनी पर सकारात्मक असर पड़ता है। सरकार इसी वजह से हर साल एमएसपी वाली फसलों की सूची बढ़ा रही है, ताकि ज्यादा किसान रासायनिक खेती छोड़ने के लिए प्रोत्साहित हों।

अधिकारियों का कहना है कि आने वाले महीनों में अदरक के अलावा और भी स्थानीय फसलों को इस सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है, खासकर पांगी, किन्नौर और चंबा जैसे दूरदराज के पहाड़ी इलाकों की उपज को ध्यान में रखते हुए।

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