एग्रीवेट: पंजाब और हरियाणा की मंडियों में धान (Paddy) की खरीद में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के नाम पर किसानों के साथ हो रही धोखाधड़ी की शिकायतें इस खरीफ सीजन (2026) में काफी बढ़ गई हैं. केंद्र सरकार की ओर से तय धान का सरकारी रेट (MSP) सामान्य धान के लिए 2441 रुपये और ग्रेड-ए धान के लिए 2461 रुपये प्रति क्विंटल है. लेकिन मंडियों में जमीनी हकीकत कुछ और ही है, जहां किसानों को अपनी फसल मजबूरन 1800 रुपये से 2200 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचनी पड़ रही है. यह आरोप भारतीय किसान यूनियन मान के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष और एमएसपी कमेटी के सदस्य गुणी प्रकाश ने लगाए हैं.
किसान नेता गुणी प्रकाश ने कहा कि सरकार ने धान खरीद के लिए नमी की अधिकतम सीमा 17 फीसदी तय की है. मिलर्स और खरीद एजेंसियां इसी नियम का फायदा उठाती हैं. किसान जब मंडी में फसल लेकर आता है, तो नमी का बहाना बनाकर खरीद को कई दिनों तक टाल दिया जाता है. फसल को मंडी में सुखाने के लिए किसान कई दिन इंतजार करता है और अंत में थक-हारकर जब वह बेचने को तैयार होता है, तो मिलर्स नमी के नाम पर प्रति क्विंटल 150 रुपये से 600 रुपये तक की सीधी कटौती (कट) कर लेते हैं या वजन में कटौती करते हैं.
भाकियू नेता ने कहा कि मंडियों में धान आने के बाद भी एजेंसियां सरकारी खरीद शुरू करने में देरी करती हैं या खरीदे गए धान का उठान (सैकड़ों बोरियों को मिलों तक ले जाना) समय पर नहीं होता. मंडियां पूरी तरह जाम हो चुकी हैं. हाल ही में हुई बेमौसम बारिश से मंडियों में खुला पड़ा धान भीग गया. भीगने के बाद धान का रंग बदल जाता है या नमी बढ़ जाती है, जिसका फायदा उठाकर मिलर्स और कम दामों पर धान खरीदने के लिए किसानों पर दबाव बनाते हैं.
किसान नेता गुणी प्रकाश ने कैथल में धान किसानों से खरीद स्थितियों की जानकारी ली.
गुणी प्रकाश ने कहा कि हरियाणा में ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ पोर्टल और पंजाब में सरकारी प्रणालियों के तहत रजिस्ट्रेशन और गेट पास कटवाने में किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. कई बार फसल का रकबा पोर्टल पर मैच नहीं होता. वेरिफिकेशन में होने वाली इस देरी के कारण किसान का नंबर नहीं आता. कर्ज चुकाने और अगली गेहूं फसल के लिए खाद-बीज खरीदने की जल्दी में किसान मजबूर होकर आढ़तियों या निजी खरीदारों को बिना सरकारी रसीद के कम रेट पर धान बेच देता है.
उन्होंने कहा कि कई प्रमुख मंडियों में समय पर सरकारी बोरियां (बारदाना) उपलब्ध नहीं कराई जाती. फसल को मंडी में खुला छोड़ने के बजाय किसान आढ़तियों के निजी बारदाने का इस्तेमाल करने को मजबूर होता है, जिसके बदले में भी उनसे अनुचित शुल्क या दाम में कटौती की जाती है.