एग्रीवेट: केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टाइक मॉडल से खेत में जमीन पर फसल उगेगी और ऊपर बिजली पैदा होगी. किसान अन्नदाता भी रहेगा और ऊर्जादाता भी बनेगा. खेती और सौर ऊर्जा के तालमेल से किसानों की कमाई बढ़ेगी. देश के 85 फीसदी छोटे और सीमांत किसानों को सबसे ज्यादा एग्रीवोल्टाइक नीति का फायदा मिलेगा. हालांकि, उन्होंने इस मॉडल के व्यवहारिक चुनौतियों से निपटने के उपायों पर काम करने की सलाह दी हैय. वहीं, केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने पीएम कुसुम योजना के अगले चरण में दुनिया का सबसे बड़ा एग्रीवोल्टाइक अभियान शुरू करने की एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि .
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस’ के उद्घाटन पर कहा कि खेती और सौर ऊर्जा का संगम विश्व कल्याण और किसानों की आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त कर रहा है. एग्रीवोल्टाइक नीति ऐसी बननी चाहिए जो देश के 85 फीसदी छोटे और सीमांत किसानों के खेतों पर व्यावहारिक रूप से खरी उतरे. उन्होंने कहा कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक से एक ही जमीन पर ऊपर सौर पैनल से बिजली पैदा होगी और नीचे फसल लहलहाएगी. उन्होंने इसे सरल देसी अंदाज में समझाते हुए कहा कि यह “आम के आम और गुठलियों के दाम” जैसा सशक्त मॉडल है.
केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि एक दौर था जब भारत खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्यान्न आयात पर निर्भर था, लेकिन आज देश के अन्नदाताओं के पसीने की बदौलत अन्न भंडार गेहूं और धान से पूरी तरह लबालब भरे हुए हैं. भारतीय कृषि क्षेत्र लगातार 4.5 फीसदी की मजबूत विकास दर बनाए हुए है, जो अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान है. कृषि उत्पादों का निर्यात 52.55 अरब डॉलर के नए रिकॉर्ड पर पहुंच चुका है और हाल ही में रबी सीजन 2026-27 की बुवाई भी शुरू हो चुकी है, जिसमें दलहन और तिलहन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि देश में औसत भूमि जोत मात्र 0.96 हेक्टेयर है और 85 फीसदी से अधिक किसान छोटे व सीमांत हैं, जिनके पास इतनी जमीन नहीं है कि वे खेती छोड़कर केवल सोलर प्लांट लगा सकें. उन्होंने जोर दिया कि प्रयोगशालाओं और सरकारी संस्थानों में तो पैसा लग जाता है, लेकिन किसान को अपनी गाढ़ी कमाई लगानी पड़ती है, इसलिए मॉडल ऐसा होना चाहिए जो छोटे किसान के खेत में व्यावहारिक रूप से सफल हो और खेती किसी भी कीमत पर न रुके. केवल सोलर पैनल के नीचे कुछ पौधे लगा देने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि पैनल की ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और जुताई की व्यवस्था ऐसी रखनी होगी ताकि किसान हर साल अपनी पसंद से फसल कर सके.
उन्होंने कहा कि सोलर पैनलों से गिरने वाले वर्षा जल के सुरक्षित निकास और संचयन का पुख्ता प्रबंध हो ताकि खेतों में मिट्टी का कटाव न हो और पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग हो सके. उन्होंने बिजली खरीद, ग्रिड तक पहुंच और किसानों को समय पर पारदर्शी भुगतान की पुख्ता व्यवस्था पक्का करने की बात कही. सुझाव दिया कि किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को इसमें सक्रिय रूप से जोड़ा जाए और उपकरणों के संचालन, मरम्मत व रखरखाव का प्रशिक्षण स्थानीय ग्रामीण युवाओं व महिलाओं को दिया जाए ताकि गांवों में ही रोजगार के अवसर तैयार हों. उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई कंपनी परियोजना बीच में छोड़ दे या अनुबंध समाप्त होने पर पैनल हटाने पड़ें, तो उसका कोई भी वित्तीय या भौतिक बोझ किसान पर न आए, इसकी जिम्मेदारी शुरुआत में ही तय होनी चाहिए.
केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने ‘टेरी’ (TERI) के अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि (लगभग 30%) एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह उपयुक्त है, जिसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की 50 फीसदी हिस्सेदारी है. उन्होंने रेखांकित किया कि यदि इस उपयुक्त भूमि के मात्र 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक लगा दिया जाए, तो भारत वर्ष 2050 तक की अपनी पूरी अनुमानित बिजली मांग को अकेले इसी से पूरा कर सकता है, साथ ही इससे फसलों की पैदावार में भी 10 से 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी देखी गई है.
उन्होंने बताया कि पीएम कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है, जिससे किसानों को रात के जोखिम भरे समय में सिंचाई से मुक्ति मिली है और दिन में निर्बाध बिजली मिल रही है. उन्होंने एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि सरकार जल्द ही पीएम कुसुम के अगले चरण के तहत दुनिया का सबसे महत्वाकांक्षी एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने जा रही है. उन्होंने कहा कि अध्ययनों के अनुसार इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख स्थानीय रोजगार पैदा होंगे, जिससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार की तलाश में जिला मुख्यालयों या बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा.