खेती में महंगी खाद का विकल्प तैयार करेगी गुजरात सरकार, 5 साल में खर्च होंगे 50 करोड़ रुपये – एग्रीवेट

Team Agrivate
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एग्रीवेट: Gujarat News: गुजरात में जैव उर्वरक और जैव कीटनाशकों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अगले पांच वर्षों में 50 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई गई है. इसके तहत शोध से लेकर व्यावसायिक उत्पादन और किसानों तक कृषि उत्पादों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत जैव विनिर्माण तंत्र विकसित किया जाएगा. आणंद कृषि विश्वविद्यालय का सूक्ष्मजीव अनुसंधान इस पहल का प्रमुख वैज्ञानिक आधार बनेगा. इसका उद्देश्य कृषि में जैव आधारित उत्पादों की उपलब्धता बढ़ाना, पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग को प्रोत्साहित करना और खेती के लिए जरूरी इनपुट के विकल्पों में विविधता लाना है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात राज्य जैव प्रौद्योगिकी मिशन (जीएसबीटीएम) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत इस योजना को विकसित कर रहा है. इसके अंतर्गत सूक्ष्मजीवों की खोज और उन पर शोध करने से लेकर उत्पाद तैयार करने, खेतों में परीक्षण  करने और किसानों तक तकनीक पहुंचाने तक की प्रक्रिया को एक साथ जोड़ा जाएगा. इस पहल में कृषि विश्वविद्यालयों, जैव प्रौद्योगिकी संस्थानों, स्टार्टअप, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), सहकारी संस्थाओं और किसानों को शामिल करने की योजना है. इससे शोध के नतीजों को व्यावसायिक उत्पादन में बदलने और जैव आधारित कृषि उत्पादों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

खेती में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश जैसे पोषक तत्वों  की अहम भूमिका होती है. हालांकि, इनके उत्पादन और आपूर्ति पर वैश्विक बाजार में होने वाले बदलावों का असर पड़ता है. नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है, जबकि फॉस्फेट और पोटाश के लिए विशेष खनिज संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है. पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता ने ऊर्जा, परिवहन और उर्वरकों की आपूर्ति शृंखला से जुड़े जोखिमों को फिर उजागर किया है. ऐसे में जैव उर्वरक, जैव उद्दीपक और सूक्ष्मजीव आधारित उत्पाद कृषि इनपुट के विकल्पों में विविधता लाने में मदद कर सकते हैं. इन उत्पादों से मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता और उनके उपयोग की दक्षता बेहतर बनाने की संभावनाएं हैं. हालांकि, जैव उत्पादों का उद्देश्य फिलहाल पारंपरिक उर्वरकों को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि उनके साथ कृषि के विकल्प बढ़ाना है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आणंद कृषि विश्वविद्यालय पहले से ही जैव उर्वरकों  के क्षेत्र में काम कर रहा है. विश्वविद्यालय ने एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, राइजोबियम और फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों पर आधारित जैव उर्वरक तकनीक विकसित की है, जिन्हें व्यावसायिक रूप से भी उपलब्ध कराया जा चुका है. विश्वविद्यालय के मुताबिक, वर्ष 2024-25 तक करीब 42 लाख लीटर जैव उर्वरक उत्पादों का उत्पादन और बिक्री हो चुकी थी. इन उत्पादों का इस्तेमाल लगभग 42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में किया गया. इसके अलावा, विश्वविद्यालय के पास जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और जैव अपघटक से जुड़े 1,000 से अधिक सूक्ष्मजीव कल्चर का संग्रह है. इसके 148 सूक्ष्मजीव स्ट्रेन के डीएनए अनुक्रम राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी सूचना केंद्र में जमा किए गए हैं. यह वैज्ञानिक आधार नई उत्पादन सुविधाएं विकसित करने में उपयोगी हो सकता है.

जीएसबीटीएम और आणंद कृषि विश्वविद्यालय के बीच 9 अक्टूबर को भावनगर में जैव उर्वरक और जैव कीटनाशक निर्माण  सुविधाएं स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाने थे. इस सहयोग का मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक शोध को व्यावसायिक उत्पादन से जोड़ना है. योजना के तहत जैव आधारित कृषि उत्पादों के निर्माण और किसानों तक उनकी पहुंच बढ़ाने पर जोर रहेगा. इससे नए उद्यमों और संस्थानों के लिए भी अवसर पैदा हो सकते हैं. यदि शोध, उत्पादन और खेतों में परीक्षण की प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे बढ़ती है, तो किसानों को जैव उर्वरक और जैव कीटनाशकों के अधिक विकल्प मिल सकते हैं. इसके साथ ही, कृषि इनपुट की आपूर्ति में विविधता लाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है.

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