गन्ना FRP पर 100 फीसदी मुनाफे का दावा गलत, अधूरे आंकड़ों पर भड़का AIKS.. 5750 प्रति टन की मांग – एग्रीवेट

Team Agrivate
8 Min Read
गन्ना FRP पर 100 फीसदी मुनाफे का दावा गलत, अधूरे आंकड़ों पर भड़का AIKS.. 5750 प्रति टन की मांग - एग्रीवेट - गन्ना FRP 100

एग्रीवेट: अखिल भारतीय किसान संघ ने केंद्र सरकार के गन्ना एफआरपी पर 100 फीसदी मुनाफे के दावे को भ्रमित करने वाला और आधे-अधूरे आकलन पर तय बताया है. केंद्र सरकार के 3650 रुपये प्रति टन एफआरपी के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि हैं सरकार इसे लागत पर 100.5 फीसदी मुनाफा बताती है, लेकिन यह गणना नकद खर्च और पारिवारिक श्रम के आधार पर की गई है. जबकि, जमीन का किराया और खेती में लगी पूंजी का ब्याज जोड़ने पर लाभ घटकर 41.5 फीसदी रह जाता है. संघ ने केंद्र सरकार से तत्काल एफआरपी 5,750 रुपये प्रति टन करने की मांग है.

महाराष्ट्र के कोल्हापुर और सांगली समेत दक्षिण महाराष्ट्र में गन्ने के दाम को लेकर किसानों का आंदोलन तेज हो गया है. अखिल भारतीय किसान सभा ने राज्य और केंद्र सरकार से आंदोलनकारी किसानों के प्रतिनिधियों के साथ तत्काल बातचीत करने और वर्ष 2026-27 के पेराई सत्र के लिए गन्ने का अंतरिम दाम घोषित करने की मांग की है. किसान सभा ने प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में गठित केंद्र सरकार की समिति के सामने मांग संबंधी ज्ञापन सौंपते हुए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) 10.25 फीसदी चीनी रिकवरी पर कम से कम 5,750 रुपये प्रति टन तय करने की मांग उठाई है.

पुणे के मांजरी बुद्रुक स्थित वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट में आयोजित सलाह-मशविरा बैठक में किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजन क्षीरसागर ने कहा कि पेराई सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन किसानों को अभी तक यह पता नहीं है कि उन्हें गन्ने का कितना दाम मिलेगा. उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि समिति गठित करके सरकारें किसानों के आंदोलन को ठंडा करने की कोशिश कर रही हैं. किसान सभा ने मांग की कि समिति 30 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करे और मौजूदा एफआरपी तथा संशोधित दाम के बीच का अंतर इसी पेराई सत्र में किसानों को देने की लिखित गारंटी दी जाए.

किसान सभा ने महाराष्ट्र सरकार पर गन्ना उत्पादन की वास्तविक लागत का आंकड़ा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) को नहीं भेजने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि . संगठन के मुताबिक तमिलनाडु, हरियाणा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश ने अपनी उत्पादन लागत के अनुमान आयोग को भेजे, लेकिन महाराष्ट्र ने ऐसा नहीं किया. आयोग ने महाराष्ट्र में गन्ने की सी-2 लागत 259 रुपये प्रति क्विंटल मानी है, जबकि किसान सभा के संशोधित आकलन में यह लागत 301 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है. संगठन का दावा है कि लागत कम आंके जाने से किसानों को वास्तविक लागत के मुकाबले पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा है.

किसान सभा ने केंद्र सरकार के 3,650 रुपये प्रति टन एफआरपी के दावे पर भी सवाल उठाए हैं. संगठन के अनुसार सरकार इसे लागत पर 100.5 फीसदी मुनाफा बताती है, लेकिन यह गणना नकद खर्च और पारिवारिक श्रम के आधार पर की गई है. जमीन का किराया और खेती में लगी पूंजी का ब्याज जोड़ने पर लाभ घटकर 41.5 फीसदी रह जाता है. किसान सभा ने लागत की गणना में कई अन्य खामियां बताते हुए महाराष्ट्र सरकार से 15 दिनों के भीतर क्षेत्रवार वास्तविक उत्पादन लागत का अनुमान समिति को सौंपने की मांग की है.

संगठन की प्रमुख मांगों में एफआरपी को कम से कम 5,750 रुपये प्रति टन और किसी भी स्थिति में 5,500 रुपये प्रति टन से कम नहीं रखना शामिल है. इसके अलावा चीनी रिकवरी की जांच पारदर्शी तरीके से कराने, एथेनॉल, बिजली और बगास से होने वाली आय को जोड़कर किसानों को कम से कम 570 रुपये प्रति टन की दूसरी किस्त देने तथा कुल भुगतान करीब 6,500 रुपये प्रति टन करने की मांग की गई है. किसान सभा ने चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलो करने, गन्ने का बकाया भुगतान 15 फीसदी ब्याज के साथ करने और बकायेदार मिलों के पेराई लाइसेंस रोकने की भी मांग रखी है.

राजन क्षीरसागर ने कहा कि समिति में किसान संगठनों और कृषि अर्थशास्त्रियों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए. उन्होंने गांवों के युवाओं से अपील की कि वे गन्ने की वास्तविक लागत का हिसाब तैयार करें और ग्राम सभाओं में प्रस्ताव पारित कर समिति को भेजें. किसान सभा ने चेतावनी दी है कि सरकार ने आंदोलनकारी किसानों से बातचीत नहीं की और अंतरिम दाम घोषित नहीं किया तो राज्यभर में आंदोलन और तेज किया जाएगा.

Share This Article