एग्रीवेट: Fertilizer Sales: अगस्त 2026 में देश में खाद की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले करीब 10.33 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. इस महीने कुल 65.1 लाख टन खाद बिकी, जबकि अगस्त 2025 में यह आंकड़ा इससे ज्यादा था. खाद की बिक्री में यह कमी ऐसे समय आई है, जब मॉनसून की बारिश भी सामान्य नहीं रही. अगस्त में देशभर में कुल बारिश सामान्य से 16.3 फीसदी कम रही.
हालांकि, खाद की बिक्री घटने का सीधा असर खरीफ की बुवाई पर अभी साफ तौर पर नहीं दिख रहा है. 11 सितंबर तक खरीफ फसलों का कुल रकबा पिछले साल इसी समय के मुकाबले करीब 1.45 फीसदी कम था. पांच साल के औसत रकबे की तुलना में भी यह करीब 0.72 फीसदी कम रहा. अब विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कितने क्षेत्र में फसल बोई गई, यह काफी नहीं होगा. असली तस्वीर फसल की प्रति हेक्टेयर पैदावार से सामने आएगी.
इस सीजन में कई इलाकों में बारिश का वितरण असमान रहा है. कहीं ज्यादा बारिश हुई तो कहीं किसान बारिश का इंतजार करते रहे. ऐसे हालात में खाद की मांग भी प्रभावित हो सकती है. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, कारोबारियों का कहना है कि बिक्री में कमी का एक कारण यह भी हो सकता है कि किसानों ने खरीफ सीजन की शुरुआत में ही जरूरत से ज्यादा खाद खरीदकर रख ली थी. ऐसे में अगस्त में उन्हें पहले से मौजूद स्टॉक के कारण कम खाद खरीदनी पड़ी. इसलिए सिर्फ बिक्री घटने के आंकड़े के आधार पर खाद की कमी या फसल पर सीधा असर तय करना सही नहीं होगा.
अगस्त में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली खाद यूरिया की बिक्री करीब 42.1 लाख टन रही. यह पिछले साल अगस्त के मुकाबले 3.66 फीसदी कम है. वहीं, डीएपी की बिक्री में हल्की बढ़ोतरी हुई. अगस्त 2026 में करीब 10.3 लाख टन डीएपी बिका, जबकि अगस्त 2025 में यह आंकड़ा करीब 9.8 लाख टन था. इसके उलट म्यूरेट ऑफ पोटाश यानी एमओपी की बिक्री करीब 10 फीसदी कम रही. दूसरे कॉम्प्लेक्स खाद की बिक्री में भी करीब 34 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद बनाने वाले कच्चे माल की कीमतों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अगस्त 2026 में सल्फर की औसत कीमत पिछले साल के मुकाबले करीब 262 फीसदी ज्यादा रही. सल्फर कॉम्प्लेक्स खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाला अहम कच्चा माल है. इसी तरह अमोनिया की कीमत करीब 23 फीसदी और फॉस्फोरिक एसिड की कीमत करीब 18 फीसदी बढ़ी. रॉक फॉस्फेट की कीमत में भी करीब 0.52 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. भारत खाद बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल के लिए दूसरे देशों पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने से देश में डीएपी और दूसरी कॉम्प्लेक्स खाद बनाने की लागत भी बढ़ सकती है.
दूसरी तरफ यूरिया के अंतरराष्ट्रीय दाम में राहत देखने को मिली है. अगस्त 2026 में आयातित यूरिया की औसत कीमत करीब 406 डॉलर प्रति टन रही. यह पिछले साल अगस्त के मुकाबले करीब 23.54 फीसदी कम है. यह कीमत नवंबर 2025 के बाद पिछले नौ महीनों में सबसे कम रही. जुलाई 2026 की तुलना में भी अगस्त में यूरिया की कीमत करीब 9.17 फीसदी नीचे आई. मई 2026 में पश्चिम एशिया संकट के दौरान यूरिया की कीमत करीब 950 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने अगस्त 2026 में करीब 7 लाख टन यूरिया का आयात किया. अंतरराष्ट्रीय कीमतों में इस गिरावट से वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार के खाद सब्सिडी खर्च के हिसाब पर भी असर पड़ सकता है.
खरीफ फसलों का रकबा पिछले साल से थोड़ा कम है, लेकिन गिरावट बहुत बड़ी नहीं है. ऐसे में आने वाले समय में फसल की प्रति हेक्टेयर पैदावार सबसे अहम होगी. बारिश, खाद का इस्तेमाल और खेतों में पोषक तत्वों की उपलब्धता इस पैदावार को प्रभावित कर सकती है. खाद की बिक्री में कमी के पीछे किसानों का शुरुआती स्टॉक भी एक वजह हो सकती है. इसलिए फसल की अंतिम पैदावार सामने आने के बाद ही यह साफ होगा कि इस साल बारिश और खाद की स्थिति का खरीफ उत्पादन पर कितना असर पड़ा.