एग्रीवेट: Paddy Farming: मौसम में बदलाव के साथ धान की फसल में ब्लास्ट, बैक्टीरियल झुलसा रोग और भूरा माहू कीट का प्रकोप बढ़ने लगा है. मिल्किंग स्टेज में पहुंच चुकी धान की फसल पर इन रोगों और कीटों का असर उत्पादन और दानों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए और शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाने चाहिए.
धान की फसल इस समय मिल्किंग स्टेज में पहुंच रही है. ऐसे में मौसम में लगातार हो रहे बदलाव के कारण फसल में रोग और कीटों का खतरा बढ़ गया है. कई खेतों में ब्लास्ट, बैक्टीरियल झुलसा और भूरा माहू जैसे रोग-कीट नजर आ सकते हैं. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसानों को फसल की नियमित निगरानी करनी चाहिए. पत्तियों, तने और बालियों पर किसी तरह के असामान्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत पहचान करना जरूरी है. शुरुआती अवस्था में रोग या कीट की पहचान होने पर नियंत्रण करना अपेक्षाकृत आसान रहता है. बिना जानकारी के रासायनिक दवाओं का अनावश्यक छिड़काव करने से भी किसानों को बचना चाहिए.
धान की फसल में ब्लास्ट रोग गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. शुरुआत में पत्तियों पर कत्थई और पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. बाद में इनका आकार आंख जैसा हो जाता है. संक्रमण बढ़ने पर रोग बालियों और दानों तक पहुंच सकता है, जिसे नेक ब्लास्ट कहा जाता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, ब्लास्ट की स्थिति में फसल में पोटाश का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. नियंत्रण के लिए साइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 120 से 150 ग्राम मात्रा को 150 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है. आवश्यकता होने पर 10 से 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव किया जा सकता है.
बैक्टीरियल झुलसा रोग में धान की पत्तियों पर कत्थई रंग की धारियां दिखाई देने लगती हैं. धीरे-धीरे पत्तियां सूखने लगती हैं और पूरा पौधा झुलसा हुआ नजर आ सकता है. सुबह के समय पत्तियों पर पीले रंग के चिपचिपे कण या बूंदें भी दिखाई दे सकती हैं. इस रोग से बचाव के लिए खेत में पानी का स्तर नियंत्रित रखना जरूरी है. रोग फैलने की स्थिति में अत्यधिक गर्मी का प्रयोग करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण बढ़ सकता है. नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्साइड क्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 500 ग्राम मात्रा और स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 15 से 20 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करने की सलाह दी गई है.
धान की फसल में भूरा माहू यानी बीपीएच भी नुकसान पहुंचाने वाला प्रमुख कीट है. बदलते मौसम में इसका प्रकोप बढ़ सकता है. यह पौधों से रस चूसकर फसल को कमजोर करता है और अधिक प्रकोप होने पर पौधे सूखने लगते हैं. इसलिए किसान खेत में पौधों के निचले हिस्से और तने के आसपास नियमित रूप से जांच करते रहें. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसी भी रोग या कीट का नियंत्रण उसकी सही पहचान के बाद ही किया जाना चाहिए. किसान सलाह के बिना अलग-अलग रसायनों को मिलाकर छिड़काव न करें. फसल की स्थिति के अनुसार कृषि विशेषज्ञ या स्थानीय कृषि विभाग से उचित सलाह लेकर ही दवा की मात्रा और छिड़काव का निर्णय लेना बेहतर है. समय पर निगरानी और सही प्रबंधन से धान की फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.