बीजों की कोठरी में सहेजी पीढ़ियों की खुशहाली, आदिवासी किसानों ने बचा रखी देसी किस्मों की विरासत – एग्रीवेट

Team Agrivate
7 Min Read

एग्रीवेट: आज जब खेती में आधुनिक और हाइब्रिड किस्मों का चलन बढ़ रहा है, तो वहीं मध्य प्रदेश के आदिवासी परिवार पारंपरिक फसलों के बीज सहेजे हुए हैं. मध्य प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार शहडोल जिले के मझगवां गांव के सलैया टोला में रहने वाले आदिवासी परिवार कई दशकों से बीजों को इकट्ठा करके रखे हैं. इतना ही नहीं वे इन्हीं की बुवाई करते हैं और उत्पादन हासिल कर फिर से बीजों को सहेजते हैं. घर की कोठरियों में सहेजे गए छोटे-छोटे बीज उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं.

मझगवां के बैगा एवं भूमिया समाज के किसान अपनी कई दशक पुरानी देसी किस्मों को आज भी संजोए हुए हैं. झोलार, बांसपोर, ठर्री, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी पारंपरिक धान की किस्में यहां के खेतों में आज भी दिखाई देती हैं. इसी तरह लेदरी कोदो, बासिन कोदो, कोदैली कोदो, बेमेरहा कुटकी, जाली कुटकी, छोटाही कुटकी, भदैली कुटकी, कागुन, समा और मिलो जैसे श्री अन्न भी यहां की खेती और भोजन का हिस्सा हैं.

कृषि विभाग के अनुसार मझगवां के किसान भोल्ली सिंह ने अपने खेतों में कई पारंपरिक फसलों को बचाकर रखा है. उनके खेत में झोलार धान, बांसपोर, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी देसी धान की किस्में हैं. साथ ही कोदो, मक्का, मिलो, कागुन, कुटकी, लेदरी कोदो और बासिन कोदो भी उगाए जाते हैं. भोल्ली सिंह के लिए इन फसलों की खुशी सिर्फ अच्छी पैदावार तक सीमित नहीं है. वे बताते हैं कि मोटा अनाज उनके रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा है. उनका कहना है कि 60 वर्ष से अधिक उम्र में भी वे 20 से 25 किलोमीटर तक साइकिल चला लेते हैं और पारंपरिक भोजन को अपनी तंदुरुस्ती से जोड़कर देखते हैं.

मझगवां के सलैया टोला की बिरमतिया बैगा ने भी अपने खेतों में पारंपरिक अनाज और धान की कई किस्मों को सुरक्षित रखा है. उनके खेत में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी फसलें उगाई जाती हैं. अलग-अलग मौसम में इन फसलों की खेती करना और उनसे प्राप्त अनाज को सुरक्षित रखना उनके परिवार की पुरानी परंपरा का हिस्सा है. बिरमतिया बैगा के लिए खेत में उगने वाला हर अनाज उनके परिवार की यादें, पुरखों की खेती की पद्धति और वर्षों से चली आ रही खाद्य परंपरा जुड़ी हुई है. वे पुराने बीजों को संभालकर रखती हैं, ताकि अगली फसल के समय इन्हीं बीजों से फिर खेती की जा सके.

वे बताती हैं कि घर में सुरक्षित रखा अनाज परिवार के भोजन में उपयोग होता है. खेत से निकला अपना धान और मोटा अनाज जब घर की रसोई तक पहुंचता है तो उसमें मेहनत के साथ अपनेपन का एहसास भी जुड़ा होता है. समा, कुटकी, सिकिया और काकुन जैसे अनाज उनके भोजन का हिस्सा हैं, वहीं सरैय्या और ठर्री जैसे पारंपरिक धान की किस्में उनकी खेती की विविधता को बनाए रखती हैं.

बिरमतिया का मानना है कि इन बीजों की पहचान गांव के खेतों और परिवारों से जुड़ी है. इसलिए उन्हें सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि आने वाले समय में भी इन पारंपरिक फसलों की खेती होती रहे और नई पीढ़ी इन अनाजों के बारे में जान सके. उनके घर में रखे बीजों की यह छोटी-सी दुनिया इस बात की गवाही देती है कि मझगवां के आदिवासी परिवारों ने आधुनिक खेती के दौर में भी अपनी पारंपरिक फसलों के लिए जगह बनाए रखी है. बिरमतिया के लिए इन बीजों की सबसे बड़ी खुशी यही है कि वे आज भी खेत में बोए जाते हैं, फसल बनकर घर आते हैं और परिवार के भोजन का हिस्सा बनते हैं.

धनवतिया बैगा भी देसी अनाज की खेती और बीज संरक्षण से जुड़ी हैं. उनके खेत में झुंझरु, पैलहाई, बरबट्टी, मक्का, कोदो, कुटकी, कागुन, भदैला कुटकी और सऊटहा कुटकी जैसी फसलें हैं. जब उनसे इन फसलों के बीजों के बारे में पूछा जाता है तो उनका सहज जवाब होता है कि बीज मिल जाएंगे और जो यहां न मिलें, वे आसपास के पहाड़ी गांवों में मिल जाएंगे. यह जवाब बताता है कि यहां बीजों का संरक्षण केवल एक परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि गांव और आसपास के समुदाय की साझा परंपरा है.

कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति के साथ किसान भोल्ली सिंह और बिरमतिया बैगा.

Share This Article